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Court News: आखिर 22 साल बाद नौकरी का रास्ता साफ, हाईकोर्ट ने खारिज की सरकार की अपील

Ranchi: Court News झारखंड हाईकोर्ट ने गुमला के कतरी जलाशय से विस्थापित एहसानुल्लाह खान को नौकरी देने के एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा है। चीफ जस्टिस डॉ रवि रंजन व जस्टिस एसएन प्रसाद की अदालत ने राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एकलपीठ का आदेश बिल्कुल सही है। इसलिए इसमें हस्तक्षेप किए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए सरकार की अपील खारिज की जाती है। इस मामले में अदालत ने दोनों पक्षों की बहस पूरी होने के बाद 20 जुलाई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

20 जुलाई को मुख्य सचिव ने कोर्ट में हाजिर होकर कहा था कि नियमानुसार अनुकंपा के आधार पर तत्काल नौकरी देने का प्रविधान है। इसके अलावा विज्ञापन के जरिए ही नियुक्ति दी जाती है। अदालत ने कहा कि इस मामले में तीन अन्य विस्थापितों को नौकरी कैसे दे दी गई। इस मामले में एकल पीठ के विज्ञापन निकालकर नियुक्ति देने के आदेश दिया था, जिसके खिलाफ सरकार अपील दाखिल की है।

इसे भी पढ़ेंः Assistant Professor Appointment: जवाब नहीं दाखिल करने पर हाईकोर्ट ने छह विश्वविद्यालयों पर दस-दस हजार का लगाया हर्जाना

न्याय नहीं मिलेगा कहां जाएगा प्रार्थी : कोर्ट
पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से कहा था कि अब प्रार्थी की नौकरी करने की उम्र समाप्त होने वाली है। अगर उसे कोर्ट से न्याय नहीं मिलेगा तो फिर उसके पास न्याय पाने का और कौन सा विकल्प बचेगा। कहा कि सरकार अपने ही वरीय पदाधिकारियों की बात नहीं मान रही है, तो फिर किसकी बात मानेगी। प्रार्थी वर्ष 1999 से काम कर रहा है।

प्रार्थी ने विस्थापित पुनर्वास के जरिए नौकरी देने के लिए अभ्यावेदन दिया था, लेकिन उसके आवेदन पर विचार नहीं किया गया। उमा देवी में पारित सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी उस पर लागू होता है। उमा देवी के मामले में सरकार ने नियम भी बनाया है कि दस साल से काम करने वालों को रिक्त पदों पर नियमित किया जाएगा। ऐसे में प्रार्थी को नौकरी क्यों नहीं दी गई।

यह है पूरा मामला
अधिवक्ता प्रेम पुजारी राय ने बताया कि कतरी जलाशय के लिए वर्ष 1989-91 में एहसानुल्लाह की आठ एकड़ जमीन ली गई। पुनर्वास नीति के तहत उसे नौकरी और अन्य सुविधाएं दी जानी थी, लेकिन अभी तक उसे नौकरी नहीं दी गई है। उसने हाई कोर्ट में तीन बार याचिका दाखिल की। हर बार अदालत ने सरकार को नौकरी देने पर विचार करने का आदेश दिया गया। लेकिन विभाग ने उसे नौकरी नहीं दी। जबकि पुनर्वास नीति के तहत छह माह में सभी सुविधाएं दी जानी चाहिए।

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