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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- विधायकों की अयोग्यता पर फैसले में देरी नहीं कर सकते राज्यपाल

New Delhi: Disqualification of MLAs सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘लाभ के पद’ मामले में भारतीय जनता पार्टी के 12 विधायकों को अयोग्य घोषित करने के संबंध में निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए विचारों को मणिपुर के राज्यपाल इस तरह दबा नहीं सकते हैं। जस्टिस एल नागेश्र्वर राव, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्‍‌ना की पीठ को जब बताया गया कि निर्वाचन आयोग से 13 जनवरी, 2021 को मिली राय पर राज्यपाल ने अभी तक कोई फैसला नही लिया है, पीठ ने उक्त बात कही।

पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने सलाह दे दी है। राज्यपाल आदेश पारित क्यों नहीं कर सकते हैं? सरकार को राज्यपाल से पूछना चाहिए। कुछ किया जाना चाहिए। निर्वाचन आयोग इस संबंध में अपनी राय जनवरी में ही दे चुका है। राज्यपाल इस फैसले को यूं दबाकर नहीं बैठ सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट कारोंग से विधायक डीडी थाईसी और अन्य द्वारा 12 विधायकों को अयोग्य घोषित करने संबंधी मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

राज्य सरकार के वकील ने सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध करते हुए कहा कि सालिसिटर जनरल दूसरी पीठ के समक्ष एक अन्य मामले में बहस कर रहे हैं। इस पर अदालत ने इसकी सुनवाई 11 नवंबर के लिए स्थगित कर दी। मणिपुर से भाजपा के 12 विधायकों पर 2018 में ‘लाभ के पद’ मामले में संसदीय सचिव के पद पर आसीन होने की वजह से अयोग्यता की तलवार लटकी है।

इसे भी पढ़ेंः Defamation case: वानखेड़े पर निजी हमले पर नवाब मलिक से हाईकोर्ट ने कहा- ट्विटर पर दे सकते हो जवाब तो कोर्ट में भी दो

इस मामले में राज्यपाल ने पिछले साल अक्टूबर में निर्वाचन आयोग की राय मांगी थी। निर्वाचन आयोग इस संबंध में अपनी राय जनवरी में ही दे चुका है। राज्यपाल इस फैसले को यूं दबाकर नहीं बैठ सकते हैं। शीर्ष अदालत कारोंग से विधायक डीडी थाईसी और अन्य द्वारा 12 विधायकों को अयोग्य घोषित करने संबंधी मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

राज्य सरकार के वकील ने सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध करते हुए कहा कि सालिसिटर जनरल दूसरी पीठ के समक्ष एक अन्य मामले में बहस कर रहे हैं। इस पर न्यायालय ने इसकी सुनवाई 11 नवंबर के लिए स्थगित कर दी। मणिपुर से भाजपा के 12 विधायकों पर 2018 में ‘लाभ के पद’ मामले में संसदीय सचिव के पद पर आसीन होने की वजह से अयोग्यता की तलवार लटकी है। इस मामले में राज्यपाल ने पिछले साल अक्टूबर में निर्वाचन आयोग की राय मांगी थी।

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