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RIMS: हाईकोर्ट ने कहा- बैक डोर से पहले सगे-संबंधियों को नियुक्त करते, फिर करते स्थायी

Ranchi: RIMS झारखंड हाईकोर्ट ने रिम्स में खाली पदों पर नियुक्ति नहीं होने पर कड़ी टिप्पणी की है। अब अदालत की अनुमति के बिना रिम्स में संविदा पर कार्यरत लोगों को स्थायी नहीं किया जाएगा। रिम्स को दो सप्ताह में विज्ञापन जारी कर नई नियुक्ति करनी होगी। अगर ऐसा करना अतिआवश्यक होगा तो इसकी पूरी स्पष्ट जानकारी कोर्ट को देनी होगी। उसके बाद अदालत इस पर निर्णय लेगी।

अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि वहां काम करने वाले अपने सगे-संबंधियों को बैक डोर से संविदा पर रखा जाता है और बाद में उनको स्थायी कर दिया जाता है। अब से किसी भी अवैध नियुक्ति को वैध नहीं किया जाएगा। अदालत की आंखों में धूल झोंका जा रहा है। इस तरह का ड्रामा बंद होना चाहिए।

कोर्ट के संयम की परीक्षा ली जा रही है। अदालत इस बात को लेकर काफी नाराज था कि आदेश के बाद भी रिम्स में खाली पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया नहीं की जा रही है। रिम्स में नर्स, पारा मेडिकल और चिकित्सकों की कमी है। कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर आ गई है और राज्य में ओमिक्रोन का मामला बढ़ता जा रहा है।

इसे भी पढ़ेंः Court News: हाईकोर्ट की टिप्पणी- राज्य की अस्मिता बचाने का वह प्रयास करेगी, भले ही सरकार को इसकी चिंता न हो

झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डा रवि रंजन व जस्टिस एसएन प्रसाद की अदालत में रौतिया समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दिए जाने के मामले में सुनवाई हुई। अदालत ने सरकार की ओर जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर नाराजगी जताई। अदालत ने सरकार को जवाब दाखिल करने का अंतिम मौका दिया है।

अदालत ने कहा कि यदि 21 जनवरी तक सरकार जवाब दाखिल नहीं करती है तो उस पर दस हजार का हर्जाना लगाया जाएगा। इस संबंध में झारखंड चेरो रौतिया न्याय संघ ने याचिका दाकिल की है। याचिका में कहा गया है कि झारखंड में रौतिया समाज लंबे समय से आदिवासी का दर्जा देने की मांग की जा रही है।

रौतिया जाति की संस्कृति आदिवासियों से काफी मेल खाती है। रहन-सहन भी आदिवासियों की है। यह भी कहा गया कि दूसरे 13 अन्य राज्य में रौतिया जाति को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला हुआ है। झारखंड में भी रौतिया को आदिवासी का दर्जा मिलना चाहिए।

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