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राहतः झारखंड में शराब के होलसेल एवं रिटेल के टेंडर में अनियमितता मामले की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

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झारखंड के जिलों में शराब के होलसेल एवं रिटेल के टेंडर में गड़बड़ी से संबंधित मामले में झारखंड हाईकोर्ट के स्वत: संज्ञान पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को रोक लगा दी । सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फिलहाल हाईकोर्ट में इससे संबंधित केस में आगे की कार्रवाही स्थगित रहेगी। हाईकोर्ट के स्वत: संज्ञान लिए जाने के खिलाफ झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की है। झारखंड सरकार ने कहा है कि कि यह मामला जनहित के योग्य नहीं है, इसमें कई तथ्यों को तोड़ मोड़ कर पेश किया गया है। प्रार्थी शिव शंकर शर्मा के इस तरह के केस को सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी निरस्त किया है। राजनीतिज्ञों के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की प्रथा चल गयी है। ऐसे मामलों में जनहित याचिका दायर कर इसका दुरुपयोग किया जा रहा है।


क्या है मामला :
दरअसल, झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड के जिलों में शराब के होलसेल एवं रिटेल के टेंडर में गड़बड़ी से संबंधित मामले में दायर उमेश कुमार की जनहित याचिका में राज्य सरकार की हस्तक्षेप याचिका (आईए) को स्वीकृत करते हुए इस केस से प्रार्थी उमेश कुमार एवं उनके अधिवक्ता राजीव कुमार का नाम हटाते हुए इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया था। राज्य सरकार की ओर से आईए दाखिल कर कहा गया था कि इस केस के प्रार्थी एवं उनके अधिवक्ता राजीव कुमार का क्रेडेंशियल सही नहीं है इसलिए इन दोनों का नाम इस केस से हटाया जाए।


जनहित याचिका में क्या है
पूर्व में झारखंड हाई कोर्ट में उमेश कुमार की जनहित याचिका में प्रार्थी के अधिवक्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया था कि राज्य के जिलों में शराब के होलसेल के टेंडर में शामिल होने के लिए 25 लाख रुपये नन रिफंडेबल राशि तय की गई थी। राज्य के विभिन्न जिलों में शराब के होलसेल और रिटेल का टेंडर लेने के लिए कोलकाता से झारखंड के तीन जिलों में अलग-अलग खातों में करोड़ों रुपये भेजे गए थे। यह उन कंपनियों के खाते में भेजा गया था जिनके खाते में मात्र दो- चार हजार रुपये हुआ करते थे। उसी खाते से सारा पैसा राज्य के अन्य जिलों में शराब के होलसेल के टेंडर के लिए 25 -25 लाख रुपया जमा करने में इस्तेमाल हुआ था। कोलकाता से भेजे गए पैसों का इस्तेमाल शराब माफिया की ओर से झारखंड के सभी जिलों में शराब के होलसेल का टेंडर लेने के लिए किया गया था। प्रार्थी ने इसकी जांच कराने का आग्रह कोर्ट से किया था।

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