हाई कोर्ट ने कहा, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के संचालन में बाधा डाल रही ब्यूरोक्रेसी

भवन निर्माण और अन्य निर्माण का आकलन यूनिवर्सिटी कैसे कर सकता है। यह आकलन करना सरकार का काम है। इससे प्रतीत होता है कि सरकार इस मामले को लटकाना चाहती है और अधिकारी इस पर तरह तरह के ऑबजेक्शन लगा कर मामले को टाल रहे हैं।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की ओर से राज्य सरकार को भेजी गई जरूरतों पर सरकार की ओर से साल खड़ा किए जाने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि हम नहीं चाहते कि लॉ यूनिवर्सिटी भी ब्यूरोक्रेसी के चक्कर में फंसी रहे।

चीफ जस्टिस डॉ रवि रंजन और जस्टिस सुजीत नारयाण प्रसाद की अदालत ने कहा कि सरकार जान कर असहयोग कर रही है और अव्यावहारिक सवाल कर रही है। सरकार की मंशा इस मामले को टालने की है। अदालत ने सरकार की ओर से दाखिल शपथपत्र को खारिज करते हुए चार सप्ताह में नया शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया।

अदालत ने अगली बार से इस मामले की हर सुनवाई राज्य के मुख्य सचिव, भवन निर्माण सचिव, वित्त सचिव, शिक्षा सचिव और संबंधित अन्य विभागों के सचिव को हाजिर रहने का निर्देश दिया। अदालत ने सरकार को चार सप्ताह में नया शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया।

गुरुवार को सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से बताया गया कि एनएलयू के कुलपति ने आधारभूत संरचना और अन्य सुविधाओं को लेकर राज्य सरकार को पत्र लिखा है। इस पर उनसे कई जानकारी मांगी गयी है। यह बताने को कहा गया है कि यह प्रस्ताव किस समक्ष प्राधिकार की मंजूरी के बाद भेजा गया है। 300 बेड के हॉस्टल के निर्माण के लिए किस संस्था से प्रोजेक्ट लिया गया है।

इस पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यूनिवर्सिटी के कुलपति जब यह जरूरत बता रहे हैं तो दूसरा कोई प्राधिकार कौन हो सकता है। भवन निर्माण और अन्य निर्माण का आकलन यूनिवर्सिटी कैसे कर सकता है। यह आकलन करना सरकार का काम है। इससे प्रतीत होता है कि सरकार इस मामले को लटकाना चाहती है और अधिकारी इस पर तरह तरह के ऑबजेक्शन लगा कर मामले को टाल रहे हैं।

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इस तरह की आपत्ति से सरकार की मंशा साफ झलक रही है। इस यूनिवर्सिटी का गठन जनहित याचिका के माध्यम से हुआ है इस कारण भी सरकार को नियमित फंड देना जरूरी है। सरकार के अधिकारियों ने यूनिवर्सिटी के कुलपित के साथ देश के कई बेहतर लॉ यूनिवर्सिटी का दौरा किया है। ऐेस में सरकार को कुछ प्लान तैयार करना चाहिए।

अदालत ने कहा कि किसी भी राज्य के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बेहतर होना जरूरी है। लेकिन एनएलयू के मामले में सरकार की मंशा साफ हो रही है। कोर्ट एलएनयू के मामले में कोई समझौता नहीं कर सकता।

यदि राज्य सरकार चाहे तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। अदालत राज्य में एनएलयू जैसे बेहतर संस्थान चाहती है। यह राज्य का गौरव है। इस संस्थान में झारखंड के लिए 50 फीसदी सीटें भी आरक्षित हैं ऐेसे में सरकार का नकारात्मक रवैया उचित नहीं है।

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