Ranchi News: झारखंड उच्च न्यायालय ने रांची जिले के कांके अंचल में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी के परिवारों को आवंटित भूमि की बंदोबस्ती (Settlement) रद्द करने के जिला प्रशासन के आदेश को खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले को पुनः सुनवाई के लिए उपायुक्त रांची के पास भेजते हुए स्पष्ट किया है कि यदि यह जमीन सार्वजनिक उद्देश्य के लिए बेहद आवश्यक है, तो प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने के पहलू पर भी विचार करना अनिवार्य होगा। यह फैसला न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता सावित्री देवी व अन्य और रूपेश कुजूर व अन्य की 2014 में दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
क्या है पूरा मामला?
- जमीन का आवंटन: वर्ष 1990-91 के दौरान तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी (SDO), सदर रांची ने राज्य सरकार के सर्कुलर/दिशानिर्देशों के तहत कांके मौजा के आर.एस. खाता संख्या 246, प्लॉट संख्या 464 स्थित ‘कैसरे-हिंद’ (सरकारी) भूमि का आवंटन SC और ST वर्ग के गरीब परिवारों को किया था।
- घर निर्माण और रसीद: आवंटन के बाद प्रभावित परिवारों का जमाबंदी कायम हुआ, वे सरकार को लगान (Rent) चुका रहे थे और वहां मकान बनाकर पिछले लगभग 35 वर्षों से परिवार सहित रह रहे हैं।
- विवाद की शुरुआत (पहला दौर): वर्ष 2001 में उपायुक्त, रांची ने यह कहते हुए बंदोबस्ती रद्द कर दी थी कि SDO के पास ‘कैसरे-हिंद’ जमीन आवंटित करने का अधिकार नहीं है। हालांकि, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने L.P.A. (No. 139/2004) में यह माना कि पुराने सरकारी आदेशों के तहत SDO को यह अधिकार प्राप्त था और मामले को पुनः विचार के लिए उपायुक्त के पास भेज दिया था।
- नया आदेश और बेदखली का नोटिस (दूसरा दौर): उपायुक्त ने 24 जनवरी 2014 को एक बार फिर नया कारण (सलामी/सुलभ शुल्क न देना और जमीन का सार्वजनिक उपयोग होना) बताते हुए आवंटन रद्द कर दिया। इसके बाद 18 फरवरी 2014 को भूमि सुधार उप समाहर्ता (LRDC) ने 5 मार्च 2014 तक जमीन खाली करने का नोटिस जारी कर दिया, जिसे याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
अदालत की मुख्य टिप्पणी एवं फैसला
- 35 वर्षों का कब्जा और निर्माण: अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता पिछले 35 वर्षों से वहां मकान बनाकर रह रहे हैं और आज भी उनका उस जमीन पर कब्जा कायम है।
- मुआवजे पर विचार नहीं: अदालत ने कहा कि यदि सरकार को किसी जनहित या सार्वजनिक कार्य के लिए इस जमीन की आवश्यकता है भी, तो याचिकाकर्ताओं द्वारा बनाए गए मकानों और उनके लंबे कब्जे के एवज में उचित मुआवजे का प्रावधान किया जाना चाहिए था, जिसकी अनदेखी उपायुक्त के आदेश में की गई थी।
- आदेश और नोटिस रद्द: अदालत ने 24.01.2014 के रद्दगी आदेश और 18.02.2014 के खाली करने के नोटिस को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया।
आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट ने इस मामले को वापस उपायुक्त, रांची के पास भेज दिया है और निर्देश दिया है कि अदालत की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए इस केस की पुनर्जंच की जाए। उपायुक्त को यह भी तय करना होगा कि क्या वास्तव में यह भूमि किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अनिवार्य है और यदि ऐसा है, तो प्रभावित परिवारों को मुआवजा किस तरह दिया जाएगा। इसी के साथ अदालत ने दोनों याचिकाओं को निष्पादित कर दिया।