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अनुकंपा पर नौकरी मिलने के बाद बहु और ससुराल वालों के बीच दूर हुए गिले-शिकवे, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीर का दिया हवाला
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चांदिल का 20 साल पुराना मामला: ससुर, सास और देवर के खिलाफ दर्ज हुआ था केस, मुख्य अपीलकर्ता ससुर की मुकदमे के दौरान हो चुकी है मौत
Ranchi News: न्याय की आस में दो दशक यानी 20 साल से अधिक समय से अदालतों के चक्कर काट रहे एक परिवार के लिए झारखंड उच्च न्यायालय ने राहत का बड़ा पैगाम दिया है। झारखंड हाईकोर्ट ने एक पारिवारिक विवाद से जुड़े आपराधिक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है। अदालत ने दोनों पक्षों के बीच हुए आपसी समझौते और सुलह (Joint Compromise) को स्वीकार करते हुए क्रिमिनल अपील को मंजूर कर लिया और आईपीसी की धारा 498-A (पति या रिश्तेदार द्वारा क्रूरता) के तहत दी गई सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया है।
क्या था पूरा मामला और कैसे उलझा था विवाद?
यह पूरा मामला सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल (इचागढ़) क्षेत्र का है। करीब 20 साल पहले सूचिका (महिला) के पति का असामयिक निधन हो गया था। पति की मौत के बाद जब वह अपने ससुराल वालों (ससुर, सास और देवर) के साथ रह रही थी, तभी परिवार में अनुकंपा के आधार पर मिलने वाली नौकरी और अन्य पारिवारिक मुद्दों को लेकर गंभीर विवाद पैदा हो गया।
स्थिति इतनी बिगड़ी कि सूचिका की शिकायत पर ससुर मोती गोप, सास कटी देवी और देवर शत्रुघन गोप के खिलाफ चांडिल थाने में आईपीसी की धारा 498-A, 328/34, 307/34 और 379 के तहत गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। निचली अदालत ने लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के आधार पर अन्य गंभीर आरोपों से तो आरोपियों को बरी कर दिया, लेकिन 30 नवंबर 2006 को केवल धारा 498-A के तहत उन्हें दोषी करार देते हुए सजा सुना दी। इस सजा के खिलाफ दोषियों ने वर्ष 2006 में ही हाईकोर्ट में क्रिमिनल अपील दाखिल की थी। मुकदमे की लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान मुख्य अपीलकर्ता यानी ससुर मोती गोप का निधन भी हो गया, जिसके बाद उनके नाम की अपील को यथावत समाप्त कर दिया गया था।
अनुकंपा नौकरी मिलने के बाद पिघला बर्फ, कोर्ट में पेश हुआ समझौता
समय के पहिए के साथ रिश्तों की कड़वाहट भी कम होती गई। इस बीच सूचिका (पूरी तरह पीड़ित महिला) को स्वर्णरेखा प्रोजेक्ट, सरायकेला-खरसावां में अनुकंपा के आधार पर ‘चपरासी’ के पद पर नौकरी मिल गई। नौकरी मिलने और जीवन पटरी पर आने के बाद परिवार के दोनों पक्षों को अहसास हुआ कि इस पुराने मुकदमे को खींचने का अब कोई औचित्य नहीं है।
इसके बाद सूचिका और जिंदा बचे अपीलकर्ताओं (सास कटी देवी और देवर शत्रुघन गोप) ने आपसी गिले-शिकवे भुलाकर सौहार्दपूर्ण माहौल में समझौता कर लिया। दोनों पक्षों की ओर से संयुक्त रूप से इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन (I.A.) दाखिल कर अदालत को बताया गया कि अब उनके बीच कोई विवाद शेष नहीं है और वे अपनी मर्जी से केस खत्म करना चाहते हैं। इस संबंध में दोनों पक्षों की ओर से शपथ पत्र (Affidavits) भी रिकॉर्ड पर लाए गए।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को बनाया आधार
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति श्री अरुण कुमार राय की अदालत ने पाया कि हालांकि आईपीसी की धारा 498-A तकनीकी रूप से एक ‘गैर-समझौता योग्य’ (Non-compoundable) अपराध है, लेकिन सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने ‘बिटन सेनगुप्ता बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ और प्रसिद्ध ‘बी.एस. जोशी मामले’ में यह स्पष्ट व्यवस्था दी है कि यदि पति-पत्नी या परिवार के सदस्य आपसी सद्भाव बहाल करने के लिए विवाद सुलझा लेते हैं, तो अदालतें तकनीकी अड़चनों को आड़े न आने दें और समझौते को स्वीकार करें।
अदालत ने कहा कि जब पक्षकार खुद शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए आगे आ चुके हैं और भविष्य में कोई विवाद न रखने की बात कह रहे हैं, तो ऐसी स्थिति में मुकदमे को आगे खींचना न्याय हित में नहीं होगा।
सजा खत्म, बेल बॉण्ड से मुक्त हुए आरोपी
हाईकोर्ट ने तमाम कानूनी पहलुओं और पारिवारिक सुलह का सम्मान करते हुए आई.ए. याचिका को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही, निचली अदालत द्वारा 30 नवंबर 2006 को दी गई दोषसिद्धि और 1 दिसंबर 2006 के सजा के आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया। 20 साल पुराने इस मामले में अपील मंजूर होने के बाद अब सभी जीवित अपीलकर्ताओं को उनके जमानत बांड (Bail Bonds) की देनदारियों से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया गया है।