Ranchi/Bokaro NEWS: झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो के चंदनकियारी थाना क्षेत्र में वर्ष 2003 के हमले और कथित आगजनी के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सात आरोपियों में से छह को सभी आरोपों से बरी कर दिया, जबकि घायल के सिर पर फावड़े से वार करने वाले अनंत मांझी की हत्या के प्रयास (धारा 307 आईपीसी) में दोषसिद्धि और सात वर्ष की सश्रम कारावास की सजा बरकरार रखी। अनंत मांझी की जमानत रद्द करते हुए उसे दो माह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर शेष सजा काटने का निर्देश दिया। ऐसा नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट को उसके विरुद्ध आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने का आदेश दिया गया। न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने ट्रायल कोर्ट के 2005 के फैसले में आंशिक संशोधन करते हुए यह आदेश पारित किया।
अभियोजन के अनुसार 18 अगस्त 2003 को पूर्व से चल रहे मुकदमे में समझौता करने का दबाव बनाने के उद्देश्य से आरोपियों ने अश्विनी मांझी के घर को घेर लिया। आरोप था कि घर में आग लगा दी गई और भाग रहे अश्विनी मांझी को पकड़कर अनंत मांझी ने फावड़े से सिर पर वार कर दिया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को दंगा, आगजनी और हत्या के प्रयास के आरोप में दोषी ठहराया था। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद कहा कि आगजनी (धारा 436 आईपीसी) के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। जांच अधिकारी ने स्वतंत्र गवाहों के बयान नहीं लिए, यह स्पष्ट नहीं किया कि मकान का कौन-सा हिस्सा जला और न ही जली हुई घरेलू सामग्री को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। ऐसे में धारा 436 के तहत सभी आरोपियों की दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि सभी आरोपियों ने किसी साझा उद्देश्य (कॉमन ऑब्जेक्ट) के तहत गैरकानूनी जमावड़ा बनाया था। इसलिए धारा 147 तथा धारा 149 के सहारे अन्य छह आरोपियों को हत्या के प्रयास का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल घटनास्थल पर मौजूद रहने मात्र से कोई व्यक्ति गैरकानूनी जमावड़े का सदस्य नहीं माना जा सकता। हालांकि अदालत ने पाया कि घायल अश्विनी मांझी और चिकित्सकीय साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि अनंत मांझी ने ही फावड़े से सिर पर गंभीर वार किया था। चिकित्सकों ने भी कहा था कि समय पर इलाज नहीं मिलता तो घायल की मृत्यु हो सकती थी। इसलिए अनंत मांझी के विरुद्ध हत्या के प्रयास का अपराध सिद्ध होता है और उसकी सजा बरकरार रखी गई। हाईकोर्ट ने छह आरोपियों को उनके जमानत बंधपत्रों से मुक्त कर दिया।