Ranchi News: झारखंड हाई कोर्ट ने दुमका के काठीकुंड थाना क्षेत्र में पुलिस टीम पर हुए हमले और पाकुड़ के तत्कालीन एसपी समेत पांच पुलिसकर्मियों की हत्या से जुड़े यूएपीए मामले में आरोपी राज कुमार भगत उर्फ राजकुमार भगत को जमानत देने से इनकार कर दिया है। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने राज कुमार भगत की क्रिमिनल अपील पर सुनवाई के बाद उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी। आरोपी ने दुमका कोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी की जमानत याचिका पहले भी 20 जुलाई 2023 को गुण-दोष के आधार पर खारिज की जा चुकी है। उस समय अदालत ने केस डायरी के में दर्ज स्वतंत्र गवाहों के बयानों का उल्लेख किया था। इन बयानों में आरोपी का नाम 29 जून 2013 को जमानी में प्रतिबंधित संगठन एमसीसी की बैठक में शामिल लोगों में बताया गया था। अभियोजन के अनुसार, इस बैठक में गंभीर आपराधिक घटना की साजिश रची गयी थी और इसके तीन दिन बाद दो जुलाई 2013 को पुलिस टीम पर हमला किया गया था।
करीब तीन साल 10 माह से जेल में है आरोपी
जमानत की मांग करते हुए आरोपी की ओर से अदालत को बताया गया कि वह सात नवंबर 2022 से न्यायिक हिरासत में है और करीब तीन साल 10 माह से जेल में बंद है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि प्राथमिकी में उसका नाम नहीं है। उसके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद नहीं हुई है और उसके खिलाफ प्रत्यक्ष या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं है। यह भी बताया गया कि अभियोजन ने मामले में 47 गवाहों की सूची सौंपी है, लेकिन अब तक 12 गवाहों की ही गवाही हुई है, जबकि 35 गवाहों की गवाही बाकी है।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि इसी मामले के सह आरोपी माधवा देहरी और दाउद उर्फ दाउद हेंब्रम को हाइकोर्ट से जमानत मिल चुकी है। ऐसे में समानता के आधार पर राज कुमार भगत को भी जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए।
समानता के आधार पर जमानत देने से कोर्ट का इनकार
हाइकोर्ट ने सहआरोपियों को मिली जमानत के आधार पर राज कुमार भगत को राहत देने से इनकार कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि किसी सह आरोपी को मिली जमानत के आधार पर दूसरे आरोपी को स्वत: जमानत का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने पाया कि माधवा देहरी और दाउद हेंब्रम को जमानत देते समय उनके खिलाफ आरोपों की प्रकृति, उन्हें अभियुक्त बनाए जाने की परिस्थितियों और उनकी हिरासत की अवधि समेत अलग-अलग तथ्यों पर विचार किया गया था।
खंडपीठ ने कहा कि आरोपी के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और केस डायरी में उसकी कथित संलिप्तता का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। ऐसे में केवल लंबी अवधि से हिरासत में रहने या मुकदमे की सुनवाई में हुई देरी के आधार पर इस स्तर पर जमानत देना उचित नहीं होगा।

