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Death of Elephant: हाईकोर्ट ने कहा- पीटीआर में बाघ नहीं, जंगल में हाथी की मौत तो पैसा जाता कहां

Ranchi: Death of Elephant झारखंड हाईकोर्ट के लातेहार जिले में एक हाथी की मौत मामले में सुनवाई करते हुए सरकार से पूछा कि पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) और एलिफेंट कॉरिडोर के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार की ओर दी गई राशि का कैसे इस्तेमाल किया गया है।

चीफ जस्टिस डॉ रवि रंजन व जस्टिस एसएन प्रसाद की अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब पीटीआर में कोई बाघ ही नहीं है और लातेहार में हाथी का बच्चा मरा हुआ मिलता है, तो केंद्र की राशि का क्या किया जाता है। इस मामले में अगली सुनवाई 21 जनवरी को निर्धारित करते हुए अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है।

सुनवाई के दौरान पीसीसीएफ सहित अन्य अधिकारी कोर्ट में ऑनलाइन जुड़े थे। इस दौरान उनकी ओर से बताया कि वर्ष 2018 में हुए सर्वे में पीटीआर में पांच बाघों के होने की सूचना थी। अभी हाल में एक दिसंबर को पीटीआर में एक बाघ देखा गया है। अब वर्ष 2022 में इनकी दोबारा गणना की जाएगी।

इसे भी पढ़ेंः Judge Uttam Anand murder case: हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच पर जताई असंतुष्टि, कहा- कोई परिणाम नहीं निकला

इस पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि क्या इन पांच सालों में वन विभाग के अधिकारियों ने बाघों के संरक्षण और उसे ट्रैक करने की कोशिश की। अदालत ने कहा कि इतना बड़ा सिस्टम किस काम का है जब बाघों के बारे में किसी को कोई जानकारी ही नहीं है। अदालत ने सरकार की ओर से दिए गए डाटा को गलत बताते हुए उसे खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि फॉरेस्ट की नौकरी करने वाले अगर किसी कर्मचारी को डर लगता है तो वह नौकरी छोड़ कर जा सकता है। पीसीसीएफ की ओर से बताया कि पीटीआर क्षेत्र में माओवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों की ओर से लगातार अभियान चलाया जाता है। दखल बढ़ने की वजह से बाघ मध्यप्रदेश के जंगलों में चले जाते हैं। पीटीआर क्षेत्र में आने वाले कई गावों को दूसरी जगह बसाया जा रहा है ताकि बाघों का संरक्षण किया जा सके। इसके बाद अदालत ने इससे संबंधित सरकार की ओर से बनाई जा रही नीति के बारे में भी जानकारी मांगी है।

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