बड़ी कार्रवाई: अदालत ने कहा- जांच से भाग रहा आरोपी, मिलीभगत से वन भूमि को निजी लोगों के नाम करने का है गंभीर आरोप
- रिकॉर्ड गायब: कोर्ट ने माना- अभी जांच जारी है और म्यूटेशन से जुड़े मूल सरकारी दस्तावेज दफ्तर से गायब हैं।
- एसीबी का कड़ा विरोध: भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने कहा- प्रतिबंधित सूची की जमीन का भू-माफिया और अफसरों ने मिलकर किया खेल।
Ranchi News: झारखंड हाई कोर्ट से हजारीबाग के बहुचर्चित वन भूमि घोटाला मामले के आरोपी तत्कालीन राजस्व कर्मचारी संतोष कुमार वर्मा को बड़ी राहत नहीं मिली है। अदालत ने मामले की गंभीरता और जांच में सहयोग न करने के रवैये को देखते हुए आरोपी कर्मचारी की अग्रिम जमानत याचिका (Anticipatory Bail) को सिरे से खारिज कर दिया है।
सुनवाई के दौरान एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की ओर से याचिका का पुरजोर विरोध किया गया। एसीबी ने अदालत को बताया कि यह भू-माफिया और तत्कालीन अंचल (सर्किल) कार्यालय के कर्मियों की मिलीभगत से सरकारी खजाने को चोट पहुंचाने और कीमती वन भूमि को हड़पने का एक बड़ा संगठित प्रयास था।
क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, हजारीबाग में 28 डिसमिल गैर मजरूआ खास जंगल-झाड़ (सरकारी वन भूमि) की अवैध खरीद-बिक्री की गई थी। आरोप है कि विनय कुमार सिंह और स्निग्धा सिंह नामक निजी व्यक्तियों के नाम पर इस सरकारी जमीन का म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) साजिश के तहत कर दिया गया। यह जमीन प्रतिबंधित सूची में शामिल थी और वन भूमि थी, जिसके दस्तावेज तत्कालीन राजस्व कर्मचारी संतोष कुमार वर्मा के पास उपलब्ध थे। इसके बावजूद, उन्होंने यह जानकारी सर्किल अफसर (CO) को उपलब्ध नहीं कराई और कथित तौर पर गलत रिपोर्ट आगे बढ़ा दी। इसके बाद एसीबी ने केस दर्ज कर जांच शुरू की थी।
बचाव पक्ष का तर्क- ‘फर्जी रिपोर्ट पर हुए हस्ताक्षर’
सुनवाई के दौरान प्रार्थी (संतोष वर्मा) के अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि वह पूरी तरह निर्दोष हैं। उन्होंने कहा कि म्यूटेशन का आदेश एक फर्जी रिपोर्ट के आधार पर जारी हुआ था, जिस पर प्रार्थी के हस्ताक्षर (Sign) थे ही नहीं। प्रार्थी ने तो मूल रूप से इस म्यूटेशन का विरोध किया था और जब यह आदेश पारित हुआ, तब तक उनका वहां से तबादला (Transfer) हो चुका था।
हाई कोर्ट ने बेल खारिज करते हुए अपने आदेश में क्या कहा?
- जांच से दूरी: अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि प्रार्थी को जांच एजेंसी द्वारा बार-बार नोटिस दिया गया, लेकिन वह एक बार भी जांच में उपस्थित नहीं हुआ।
- साक्ष्य मौजूद: एसीबी द्वारा दाखिल प्रति शपथपत्र (Counter Affidavit) में आरोपी कर्मचारी के खिलाफ पर्याप्त और पुख्ता सामग्रियां प्रस्तुत की गई हैं।
- सह-आरोपी का बयान: मामले के अन्य सह-आरोपियों ने भी अपने बयानों में संतोष कुमार वर्मा की भूमिका और संलिप्तता का स्पष्ट जिक्र किया है।
मूल रिकॉर्ड गायब होने से कोर्ट गंभीर
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर गहरी चिंता जताई कि मामले की जांच अभी बेहद प्रारंभिक और महत्वपूर्ण मोड़ पर है, और सबसे बड़ी बात यह है कि संबंधित खाता नंबर का मूल म्यूटेशन रिकॉर्ड ही सरकारी कार्यालय से गायब है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि प्रार्थी किसी भी कीमत पर अग्रिम जमानत पाने का अधिकारी नहीं है और याचिका को खारिज कर दिया।