सुप्रीम कोर्ट से ‘एक राष्ट्र एक दंड संहिता’ की गुहार, 161 साल पुराने आईपीसी को खत्म करने की मांग

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court Of India) में एक जनहित याचिका दायर कर 161 वर्ष पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) को खत्म करने की गुहार लगाई गई है।

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court Of India) में एक जनहित याचिका दायर कर 161 वर्ष पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) को खत्म करने की गुहार लगाई गई है। याचिका में ‘एक राष्ट्र एक दंड संहिता’ को सुनिश्चित करने की भी मांग की है। याचिका में केंद्र को एक न्यायिक पैनल या विशेषज्ञों के एक निकाय का गठन करने का निर्देश देने की मांग की गई है, जो कानून का शासन एवं समानता को सुनिश्चित करने और भारतीय दंड संहिता-1860 सहित मौजूदा कानूनों का परीक्षण करने के बाद एक व्यापक और कड़े दंड संहिता का मसौदा तैयार करे।

भाजपा नेता व वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में वैकल्पिक रूप से सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया कि संविधान का संरक्षक और मौलिक अधिकारों का रक्षक होने के नाते वह, भारत के विधि आयोग को भ्रष्टाचार और अपराध से संबंधित घरेलू और आंतरिक कानूनों का परीक्षण करने और छह महीने के भीतर कठोर व व्यापक भारतीय दंड संहिता एक मसौदा तैयार करने का निर्देश दे सकती है।

वकील अश्विनी दुबे के माध्यम से दायर इस जनहित याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार को एक न्यायिक आयोग या एक विशेषज्ञ समिति का गठन करने का निर्देश दिया जाना चाहिए, जो भ्रष्टाचार व अपराध से संबंधित सभी घरेलू व आंतरिक कानूनों का परीक्षण करे और ‘एक राष्ट्र एक दंड संहिता’ का मसौदा तैयार करे, जिसके जरिए कानून का शासन, समानता और समान सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

इसे भी पढ़ेंः हाईकोर्ट ने ईडी और इनकम टैक्स से पूछा- कैसे रिलीज होगी जब्त राशि

याचिका में यह भी कहा गया है कि भ्रष्टाचार और अपराध से संबंधित मौजूदा पुराने कानूनों के बजाय एक कड़े और व्यापक भारतीय दंड संहिता (एक राष्ट्र एक दंड संहिता) को लागू करने की व्यवहार्यता का पता लगाने का भी प्रयास किया जाना चाहिए। 161 साल पुराने औपनिवेशिक आईपीसी के कारण जनता को जो चोट लगी है वह बहुत बड़ी है। 

रिश्वत, मनी लॉन्ड्रिंग, काला धन, मुनाफाखोरी, मिलावट, जमाखोरी, कालाबाजारी, नशीली दवाओं की तस्करी, सोने की तस्करी और मानव तस्करी पर विशिष्ट अध्याय वाले कड़े व व्यापक ‘एक राष्ट्र एक दंड संहिता’ को लागू किए बिना कानून के शासन और जीवन के अधिकार, स्वतंत्रता और गरिमा को सुरक्षित नहीं किया जा सकता है।

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि अगर यह आईपीसी थोड़ा भी प्रभावी होती तो स्वतंत्रता सेनानियों को नहीं बल्कि कई अंग्रेजों को सजा मिलती। वास्तव में आईपीसी, 1860 और पुलिस अधिनियम, 1861 बनाने के पीछे मुख्य कारण 1857 की तरह के विद्रोह को रोकना था। ऑनर किलिंग, मॉब लिंचिंग, गुंडा एक्ट आदि से संबंधित कानून आईपीसी में शामिल नहीं हैं जबकि ये अखिल भारतीय अपराध हैं। वर्तमान में विभिन्न राज्यों में एक ही अपराध के लिए सजा अलग है। इसलिए सजा को एकसमान बनाने के लिए एक नई आईपीसी जरूरी है।

Most Popular

भीख मांगना सामाजिक-आर्थिक मामला, गरीबी के कारण ही मजबूर होते हैं लोगः सुप्रीम कोर्ट

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भीख मांगना एक सामाजिक और आर्थिक मसला है और गरीबी, लोगों को भीख मांगने के...

जासूसी मामलाः जांच समिति की रिपोर्ट अभियोजन का आधार नहीं हो सकती, सीबीआई कानून के मुताबिक जांच करेः सुप्रीम कोर्ट

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसरो वैज्ञानिक नम्बी नारायणन से संबधित 1994 के जासूसी मामले में दोषी पुलिस अधिकारियों की...

विधायक खरीद-फरोख्त मामलाः HC में PIL दाखिल, कांग्रेसी विधायक अनूप सिंह के कॉल डिटेल की जांच की मांग

Ranchi: हेमंत सरकार (Hemant Government) को गिराने की साजिश का मामला अब झारखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। पंकज कुमार यादव की...

तमिलनाडु की पूर्व CM जयललिता की मौत की जांच की मांग को लेकर DMK ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका

New Delhi: तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता (Ex Tamil Nadu CM Jayalalithaa) की मौत की जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट...