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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सही बात का समर्थन करने वाले जज बनाए जा रहे निशाना, अमीर-गरीब के लिए अलग कानून नहीं हो सकता

Devesh Ananad
By Devesh Ananad On 23 Jul, 2021
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Delhi: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने कहा कि देश में अमीर, संसाधनों से युक्त और राजनीतिक रूप से ताकतवर लोगों और न्याय तक पहुंच एवं संसाधनों से वंचित छोटे लोगों के लिए दो समानांतर कानूनी प्रणालियां नहीं हो सकतीं। अदालत ने यह भी कहा कि जिला न्यायापालिका से औपनिवेशिक सोच के साथ किए जा रहे व्यवहार को नागरिकों के विश्वास को बचाए रखने के लिए बदलना होगा। जब न्यायाधीश सही के लिए खड़े होते हैं, तो उन्हें निशाना बनाया जाता है।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कांग्रेस नेता देवेंद्र चौरसिया की हत्या के मामले में मध्य प्रदेश की बसपा (बहुजन समाज पार्टी) विधायक के पति को दी गई जमानत को खारिज करते हुए ये अहम टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका लोकतंत्र का आधार है और इस पर किसी प्रकार का राजनीतिक दबाव नहीं होना चाहिए। अदालत ने कहा कि भारत में अमीर, संसाधनों से युक्त और राजनीतिक रूप से ताकतवर लोगों और न्याय तक पहुंच एवं संसाधनों से वंचित छोटे लोगों के लिए दो अलग-अलग समानांतर कानूनी प्रणालियां नहीं हो सकतीं।

दोहरी व्यवस्था की मौजूदगी कानून की वैधता को खत्म कर देगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोहरी व्यवस्था की मौजूदगी कानून की वैधता को ही खत्म कर देगी। कानून के शासन के लिए प्रतिबद्ध होने का कर्तव्य सरकारी तंत्र का भी है। अदालत ने कहा कि जिला न्यायपालिका नागरिकों के साथ संपर्क का पहला बिंदु है। पीठ ने कहा कि अगर न्यायपालिका में नागरिकों का विश्वास कायम रखना है तो जिला न्यायपालिका पर ध्यान देना होगा।

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निचली अदालतों के न्यायाधीश भयावह परिस्थितियों के बीच काम करते हैं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों के न्यायाधीश भयावह परिस्थितियों, बुनियादी ढांचे की कमी, अपर्याप्त सुरक्षा के बीच काम करते हैं और न्यायाधीशों को सही के लिए खड़े होने पर निशाना बनाए जाने के कई उदाहरण हैं। पीठ ने कहा कि दुख की बात है कि स्थानांतरण और पदस्थापना के लिए उच्च न्यायालयों के प्रशासन की अधीनता भी उन्हें कमजोर बनाती है।

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अदालत ने कहा कि जिला न्यायपालिका के साथ औपनिवेशिक मानसिकता वाला व्यवहार बदलना चाहिए और ऐसा होने पर ही प्रत्येक नागरिक, भले वह आरोपी हो, पीड़ित हो या नागरिक समाज का सदस्य है, उसकी नागरिक स्वतंत्रत हमारी निचली अदालतों में सार्थक रूप से संरक्षित रहेगी। ये निचली अदालतें उन लोगों की रक्षा की पहली ढाल हैं, जिनके साथ गलत हुआ है।

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न्यायपालिका और प्रत्येक जज की स्वतंत्रता जरूरी

अदालत ने कहा कि एक स्वतंत्र संस्था के रूप में न्यायपालिका का कार्य शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा में निहित है। पीठ ने कहा कि न्यायाधीश किसी भी अन्य कारकों की बाधा के बिना कानून के अनुसार विवादों को सुलझाने में सक्षम होने चाहिए और इसके लिए न्यायपालिका और प्रत्येक न्यायाधीश की स्वतंत्रता जरूरी है।

न्यायपालिका को राजनीतिक दबावों और विचारों से हो मुक्त

अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत न्यायाधीशों की स्वतंत्रता में यह भी शामिल है कि वे अपने वरिष्ठों और सहयोगियों से स्वतंत्र हों। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान विशेष रूप से जिला न्यायपालिका की स्वतंत्रता की परिकल्पना करता है जिसका उल्लेख अनुच्छेद 50 में किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीशों के व्यक्तिगत निर्णय लेने और संबंधित कानूनों के तहत अदालती कार्यवाही के संचालन से न्यायपालिका और कार्यपालिका के इस विभाजन का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि न्यायपालिका को राजनीतिक दबावों और विचारों से मुक्त होना चाहिए।

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देवेश आनंद को पत्रकारिता जगत का 15 सालों का अनुभव है। इन्होंने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में काम किया है। अब वह इस वेबसाइट से जुड़े हैं।

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