39 साल की सेवा के बाद लगे थे फर्जी नौकरी के आरोप
Ranchi News: झारखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि विभागीय जांच (Departmental Proceeding) एक अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया है, जिसमें किसी भी दस्तावेज को मौखिक गवाही के बिना साबित नहीं माना जा सकता। जस्टिस दीपक रोशन की एकलपीठ ने सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) के एक पूर्व कर्मचारी अभय कुमार की बर्खास्तगी के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। अदालत ने प्रबंधन को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता को 12 सप्ताह के भीतर उनके सभी सेवानिवृत्ति और वित्तीय लाभों का भुगतान करें।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता अभय कुमार के मामले के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- लंबी सेवा अवधि: अभय कुमार को 19 जून 1980 को उनकी मां जिरवा कामिन की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद सीसीएल के धोरी कोलियरी में नियुक्त किया गया था, जहां उन्होंने लगभग 39 वर्षों तक बेदाग सेवा की।
- अचानक शिकायत और चार्जशीट: साल 2019 में (उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक पहले) एक शिकायत के आधार पर उन्हें चार्जशीट सौंपी गई। आरोप था कि उन्होंने खुद को जगदेव भुइयां का बेटा बताकर गलत तरीके से नौकरी हासिल की।
- बिना गवाही के बर्खास्तगी: जांच अधिकारी ने 18 बैठकें कीं, लेकिन प्रबंधन की ओर से एक भी मौखिक गवाह पेश नहीं किया गया। इसके बावजूद, दिसंबर 2021 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया, जबकि वे 31 दिसंबर 2021 को सेवानिवृत्त होने वाले थे। बाद में अपीलीय प्राधिकारी ने भी इस सजा को बरकरार रखा।
अदालत की महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणियां
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पूरी जांच में न तो शिकायतकर्ता उपस्थित हुआ और न ही किसी दस्तावेज को कानूनी रूप से साबित किया गया। उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के कई पुराने और हालिया फैसलों (जैसे जय प्रकाश सैनी, रूप सिंह नेगी और सरोज कुमार सिन्हा मामले) का हवाला देते हुए कहा:
“कोई भी दस्तावेज खुद को साबित नहीं करता। विभागीय जांच में आरोपों को सिद्ध करने के लिए संबंधित दस्तावेजों की प्रामाणिकता की पुष्टि किसी ऐसे गवाह द्वारा कराई जानी अनिवार्य है जिसे उसकी जानकारी हो। मौखिक गवाही के अभाव में केवल कागजों को आधार मानकर दी गई बर्खास्तगी की सजा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निष्पक्ष प्रक्रिया का उल्लंघन है।”
12 सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने माना कि बिना किसी ठोस गवाही के याचिकाकर्ता को दोषी ठहराना और नौकरी से निकालना पूरी तरह से गैर-कानूनी था। चूंकि याचिकाकर्ता दिसंबर 2021 में ही अपनी सुपरएनुएशन (सेवानिवृत्ति) की आयु पूरी कर चुके हैं, इसलिए अदालत ने बर्खास्तगी और अपील के आदेशों को खारिज कर दिया। अब सीसीएल प्रबंधन को आदेश की प्रति मिलने के 12 सप्ताह के भीतर अभय कुमार को ग्रेच्युटी, भविष्य निधि (PF), सीएमपीएस 1998 के तहत पेंशन और अर्जित अवकाश (Leave Encashment) सहित सभी टर्मिनल और बकाया मौद्रिक लाभों का भुगतान करना होगा। इसी के साथ अदालत ने इस रिट याचिका को मंजूर कर लिया।