Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारी अधिकारों के पक्ष में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी को अदालत द्वारा रद्द कर दिया जाता है और नियोक्ता उसके खिलाफ समय पर विभागीय कार्रवाई पूरी नहीं करता, तो ऐसी स्थिति में ‘नो वर्क, नो पे’ (काम नहीं तो वेतन नहीं) का सिद्धांत लागू नहीं होगा। जस्टिस की पीठ ने सीसीएल (CCL) के 24 दिसंबर 2014 के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता बैजनाथ महतो को बकाया वेतन देने से मना किया गया था।
मामला क्या था?
- 1981 में बहाली और 1989 में बर्खास्तगी: बैजनाथ महतो को विस्थापित कोटे से सीसीएल में नौकरी मिली थी। चोरी के एक मामले के बाद उन्हें बर्खास्त किया गया, लेकिन बाद में वे कोर्ट से बरी हो गए।
- नियोक्ता की लापरवाही: वर्ष 2009 में हाईकोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी को रद्द करते हुए सीसीएल को तीन महीने के भीतर नई विभागीय जांच पूरी करने को कहा था। परंतु, सीसीएल ने कई वर्षों तक न तो जांच पूरी की और न ही उन्हें काम पर वापस लिया। अंततः उन्हें 2015 में बहाल किया गया और उसी वर्ष वे सेवानिवृत्त हो गए।
- कोर्ट का अहम सिद्धांत: अदालत ने कहा कि कोई भी विभाग या कंपनी अपनी खुद की गलती या लापरवाही का फायदा उठाकर कर्मचारी को उसके आर्थिक लाभों से वंचित नहीं रख सकती। कोर्ट ने सीसीएल को आदेश दिया कि वह बैजनाथ महतो को वर्ष 1989 से उनकी पुनर्बहाली तक का पूरा बकाया वेतन, पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ 6 सप्ताह के भीतर भुगतान करे।

