Ranchi / Dhanbad News: झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद जिले के पाथरडीह कोल वाशरी (Pathardih Coal Washery) के लिए वर्ष 1960-61 में अधिग्रहित की गई लगभग 200 एकड़ जमीन को मूल रैयतों के कानूनी वारिसों को वापस लौटाने की मांग वाली याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने डब्ल्यू.पी.(सी) सं. 6048/2013 (दीपक कुमार महतो व अन्य बनाम झारखंड राज्य व अन्य) पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि जमीन का अधिग्रहण पूरी तरह से कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए किया गया था और मुआवजा राशि भी प्राप्त की जा चुकी थी। अदालत ने टिप्पणी की कि 5 दशक (50 से अधिक वर्ष) से भी अधिक पुराने और निष्पादित हो चुके अधिग्रहण मामलों को पुनः खोलने का कोई वैध आधार नहीं बनता है।
📌 मुख्य बिंदु और कानूनी पक्ष
- अधिग्रहण प्रक्रिया का पालन: अदालत ने स्पष्ट किया कि जमीन को किसी आपातकालीन प्रावधान (Section 17) के तहत अधिग्रहित नहीं किया गया था, बल्कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 के तहत अधिसूचना जारी कर धारा 5-A के तहत आपत्तियां मांगी गई थीं। इसके बाद नियमानुसार अवार्ड घोषित किया गया था।
- मुआवजा प्राप्त होने की पुष्टि: राज्य सरकार एवं भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों और अवार्ड वाउचर से यह सिद्ध हुआ कि याचिकाकर्ताओं के पूर्वजों ने वर्ष 1963 में ही मुआवजा राशि प्राप्त कर ली थी।
- निजी कंपनी को जमीन हस्तांतरित न करने का स्पष्टीकरण: याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि BCCL इस जमीन को मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लिमिटेड नामक निजी कंपनी को सौंप रही है। BCCL ने स्पष्ट किया कि जमीन का कोई मालिकाना हक हस्तांतरित नहीं किया गया है; कंपनी को केवल ‘Build, Operate and Maintain’ (BOM) मॉडल के तहत वाशरी के निर्माण और संचालन का ठेका (अनुबंध) दिया गया है।
- लगान रसीद और CNT एक्ट का तर्क खारिज: कोर्ट ने कहा कि केवल लगान रसीद कटाने से किसी को मालिकाना हक प्राप्त नहीं होता। इसके अलावा, एक बार राज्य द्वारा सार्वजनिक उद्देश्य के लिए वैध अधिग्रहण पूरा हो जाने के बाद छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) के तहत हस्तांतरण पर रोक संबंधी प्रावधान आड़े नहीं आते।
⚖️ हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों (इन्दौर डेवलपमेंट अथॉरिटी एवं अन्य) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि जब भूमि का अधिग्रहण विधिपूर्वक पूर्ण हो चुका हो और मुआवजा लिया जा चुका हो, तो जमीन मूल मालिकों को वापस नहीं लौटाई जा सकती। सार्वजनिक उपयोग हेतु अधिग्रहित भूमि यदि किसी हिस्से में बची भी है, तो उसे अन्य सार्वजनिक कार्यों में लिया जा सकता है। अदालत ने याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए इसे निष्पादित एवं खारिज घोषित कर दिया।

