Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को बड़ा राहत देते हुए 22 साल पुराने उस औद्योगिक न्यायाधिकरण के अवार्ड को रद्द कर दिया है, जिसमें 28 कर्मचारियों की सेवा नियमित (रेगुलर) करने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी की अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पटना स्थित राज्य औद्योगिक न्यायाधिकरण को इस विवाद की सुनवाई का अधिकार ही नहीं था। साथ ही अदालत ने पाया कि जिस दस्तावेज के आधार पर कर्मचारियों की पहचान की गई, वह प्रथम दृष्टया गढ़ा हुआ (फैब्रिकेटेड) प्रतीत होता है। मामला वर्ष 2000 में केंद्र सरकार द्वारा किए गए एक औद्योगिक विवाद संदर्भ से जुड़ा था। पटना औद्योगिक न्यायाधिकरण ने 23 सितंबर 2004 को 28 कर्मियों को नियमित करने का आदेश दिया था, जिसे एफसीआई ने झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों की नियुक्ति और नियमितीकरण का पूरा कारण रांची से जुड़ा था, इसलिए झारखंड हाईकोर्ट को याचिका सुनने का अधिकार है। लेकिन जिस संदर्भ (रेफरेंस) को केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण को भेजा गया था, उसका फैसला राज्य औद्योगिक न्यायाधिकरण, पटना ने दे दिया। यह मूल अधिकार क्षेत्र (जूरिस्डिक्शन) का गंभीर उल्लंघन है। ऐसे आदेश को कानून की नजर में शून्य माना जाएगा।
कर्मचारियों की सूची ही नहीं थी
हाईकोर्ट ने पाया कि केंद्र सरकार के संदर्भ आदेश में उन 28 कर्मचारियों के नाम, पता और अन्य विवरण संलग्न ही नहीं थे, जिनकी सेवा नियमित करने का प्रश्न था। बाद में जिस सूची (एक्ज़िबिट-डब्ल्यू/4) के आधार पर न्यायाधिकरण ने निर्णय दिया, उसमें वर्ष 1995 का दस्तावेज होने के बावजूद कर्मचारियों के पते में “झारखंड” लिखा था, जबकि झारखंड राज्य का गठन वर्ष 2000 में हुआ। अदालत ने इसे दस्तावेज की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल माना।
साक्ष्य भी अविश्वसनीय
अदालत ने यह भी कहा कि 28 में से केवल तीन कर्मचारियों ने गवाही दी। एक महिला गवाह ने वर्ष 2004 में अपनी उम्र 35 वर्ष बताई, जबकि उसने दावा किया कि वह 1978 से एफसीआई में काम कर रही थी। इसका अर्थ यह हुआ कि नियुक्ति के समय उसकी उम्र केवल नौ वर्ष होती। अदालत ने कहा कि ऐसे विरोधाभासों को नजरअंदाज करना न्यायाधिकरण की गंभीर त्रुटि है। इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने औद्योगिक न्यायाधिकरण, पटना का 2004 का अवार्ड रद्द करते हुए एफसीआई की याचिका स्वीकार कर ली।

