- हाईकोर्ट का सख्त फैसला, 38.64 करोड़ की शुरुआती योजना की जगह अब 2.68 करोड़ में होगा काम
- हजारीबाग के 20 चौक-चौराहों पर चार महीने में लगेंगे ट्रैफिक सिग्नल
- हाईकोर्ट ने डीसी, एसपी और नगर आयुक्त को ठहराया व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार, चार महीने में देना होगा अनुपालन शपथपत्र
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग शहर में व्याप्त भीषण ट्रैफिक जाम, अनियंत्रित यातायात और नागरिक कुप्रबंधन को लेकर दायर जनहित याचिका (W.P. PIL No. 4534/2021) पर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नागरिकों को साफ-सुथरा, गरिमामपूर्ण और सुरक्षित शहरी जीवन जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने हजारीबाग के डीसी, एसपी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए कई सख्त निर्देश जारी किए हैं।
1. किसने दाखिल की थी जनहित याचिका?
याचिकाकर्ता: यह जनहित याचिका अच्युत स्वरूप मिश्रा (Achyut Swaroop Mishra) द्वारा व्यक्तिगत रूप से (Party-in-Person) दायर की गई थी।
मुख्य मांग: याचिका में हजारीबाग शहर में ट्रैफिक के अराजक माहौल, ऑटोमैटिक ट्रैफिक लाइट, सीसीटीवी सर्विलांस की कमी, पार्किंग की समस्या और सड़कों व फुटपाथों पर अवैध अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की गई थी।
2. किस अधिवक्ता को किया गया था निरीक्षण के लिए नियुक्त?
अधिवक्ता आयुक्त (Advocate Commissioner): मामले की गंभीरता को देखते हुए, पूर्व में खंडपीठ ने श्री प्रशांत पल्लव (Mr. Prashant Pallav), जो उस समय हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता थे (और बाद में भारत के अपर महाधिवक्ता – A.S.G.I. नियुक्त हुए), को अधिवक्ता आयुक्त के रूप में नियुक्त किया था।
निरीक्षण रिपोर्ट: उन्होंने हजारीबाग शहर का दौरा कर एक व्यापक रिपोर्ट कोर्ट में सौंपी थी, जिसमें इस बात की पुष्टि हुई थी कि शहर में ट्रैफिक की स्थिति बेहद अराजक है, प्रमुख चौराहों पर ट्रैफिक पुलिसकर्मी नहीं हैं, सीसीटीवी कैमरे खराब पड़े हैं और जगह-जगह अवैध पार्किंग व अतिक्रमण की समस्या है।
3. योजना की लागत: 38.64 करोड़ से घटकर हुई 2.68 करोड़
प्रारंभिक (पुरानी) योजना और राशि: नगर निगम ने शुरुआत में ट्रैफिक मॉनिटरिंग सिस्टम के लिए ₹38.64 करोड़ (लगभग) की एक कार्ययोजना और प्रस्ताव वित्तीय स्वीकृति के लिए शहरी विकास एवं आवास विभाग को सौंपा था।
अदालत की आपत्ति और संशोधित राशि: हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस राशि को अत्यधिक व अनुपातहीन माना। इसके बाद पुरानी योजना को छोड़ दिया गया और एक नई टेंडर प्रक्रिया के तहत ₹2.68 करोड़ (लगभग) की लागत से ‘कीहोल डिजाइन प्राइवेट लिमिटेड’ (M/s. Keyhole Design Private Limited) के साथ 19 अगस्त 2026 को ऑटोमैटिक ट्रैफिक लाइट Management System के लिए अनुबंध किया गया।
4. प्रमुख निर्देश और अदालत के आदेश के बिंदु
चार महीने में ट्रायल रन: अदालत ने निर्देश दिया है कि इस अनुबंध के तहत सभी कार्य पूरे कर आगामी चार महीनों के भीतर बीस प्रमुख चौराहों (जैसे कोर्ट कचहरी चौक, कोर्रा चौक, मटवारी चौक, बड़कागांव मोर, झंडा चौक आदि) पर इसका ट्रायल रन शुरू किया जाए।
सी.सी.टी.वी. कैमरों की सुदृढ़ व्यवस्था: डीसी और एसपी को संयुक्त रूप से निर्देश दिया गया है कि वे 2017 से अब तक लगाए गए सभी सीसीटीवी कैमरों की कार्यप्रणाली और स्टोरेज की स्थिति पर दो महीने के भीतर रिपोर्ट दें। जो कैमरे खराब हैं, उन्हें चार महीने के भीतर ठीक या बदला जाए।
फुटपाथों और सड़कों से अतिक्रमण हटाओ अभियान: अदालत ने स्पष्ट किया है कि पैदल चलने वालों के लिए बने फुटपाथों और सार्वजनिक सड़कों पर अवैध कब्जा या अनधिकृत वेंडर बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे। झारखंड नगरपालिका अधिनियम, 2012 के तहत पुनः अतिक्रमण करने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
स्ट्रीट वेंडर्स के लिए वेंडिंग जोन: स्ट्रीट वेंडर्स (आजीविका संरक्षण और विनियमन) अधिनियम, 2014 के तहत चार महीने के भीतर वेंडिंग और नॉन-वेंडिंग जोन का सर्वे पूरा कर अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया गया है।
भारी वाहनों के प्रवेश पर पाबंदी: सुबह 08:00 बजे से रात 08:00 बजे तक म्युनिसिपल सीमा के भीतर आवश्यक सेवाओं को छोड़कर भारी और वाणिज्यिक माल वाहक वाहनों के प्रवेश पर रोक को सख्ती से लागू किया जाएगा।
साइलेंट जोन की घोषणा: सिविल कोर्ट परिसर, सदर अस्पताल, आरोग्यम अस्पताल, संत कोलंबस कॉलेज और कार्मेल स्कूल के आसपास के 100 मीटर के दायरे को दो महीने के भीतर ‘साइलेंट जोन’ (Silence Zone) के रूप में अधिसूचित किया जाएगा।
5. अधिकारियों को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अधिकारी अब केवल कागजी आश्वासन नहीं दे सकते, बल्कि धरातल पर ठोस कार्रवाई करनी होगी।
हजारीबाग के उपायुक्त (DC), पुलिस अधीक्षक (SP) और नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) को इन सभी बिन्दुओं पर चार महीने के भीतर अपना व्यक्तिगत अनुपालन हलफनामा (Personal Compliance Affidavit) हाईकोर्ट में दाखिल करना होगा। यह हलफनामा किसी अधीनस्थ अधिकारी द्वारा नहीं, बल्कि खुद इन प्रमुख अधिकारियों द्वारा दायर किया जाना अनिवार्य है।

