Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस (Check Bounce) के 10 साल पुराने एक मामले में दोषी करार दिए गए व्यक्ति को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने रोशन प्रसाद की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज कर दिया है। अदालत ने निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई 5 महीने की कैद और 2 लाख रुपये के मुआवजे के आदेश को सही ठहराया है।
मामले के मुख्य बिंदु
- याचिकाकर्ता (दोषी): रोशन प्रसाद।
- विवाद: नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस का मामला।
- निचली अदालत का फैसला: 2 मार्च 2016 को न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी (रांची) ने 5 माह के साधारण कारावास और 2 लाख रुपये मुआवजे की सजा सुनाई थी।
- हाईकोर्ट का आदेश: सजा बरकरार; दोषी को दो महीने के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण (Surrender) करने का निर्देश।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद एक कारोबारी लेन-देन से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के अनुसार, उसने रोशन प्रसाद को 4.25 लाख रुपये अग्रिम (Advance) दिए थे, जिसमें से 2.25 लाख रुपये बकाया रह गए थे। इस बकाये को चुकाने के लिए आरोपी ने 50-50 हजार रुपये के दो चेक और 1.50 लाख रुपये का एक चेक (कुल तीन चेक) जारी किए थे। बैंक में जमा करने पर तीनों चेक बाउंस हो गए। कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद जब आरोपी ने भुगतान नहीं किया, तो उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां और निष्कर्ष
- नकद भुगतान का दावा खारिज: हाईकोर्ट में आरोपी ने यह दावा किया कि उसने शिकायतकर्ता को 2 लाख रुपये नकद लौटा दिए थे और साक्ष्य के तौर पर एक रसीद (Ext-A) पेश की।
- साक्ष्य साबित करने में विफलता: अदालत ने पाया कि बचाव पक्ष इस रसीद को कानूनी रूप से साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। यहां तक कि ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता से जिरह (Cross-examination) करते समय भी इस रसीद को लेकर कोई सवाल नहीं पूछा गया था।
- निचली अदालत के फैसले में कोई त्रुटि नहीं: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत द्वारा दिए गए फैसले साक्ष्यों पर आधारित हैं और इनमें कोई कानूनी त्रुटि (Legal Error) नहीं है, इसलिए सजा में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

