2022 से लंबित चेक बाउंस केस में सुनवाई अंतिम चरण में थी, कोर्ट ने कहा- देर से उठाया गया हस्ताक्षर का सवाल कार्यवाही टालने की कोशिश
Ranchi News: 12.50 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में हस्ताक्षर की जांच के लिए चेक को एफएसएल भेजने की मांग को न्यायायुक्त की अदालत ने खारिज कर दिया। न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1 की अदालत ने कहा कि आरोपी ने मुकदमे की शुरुआत से चेक पर अपने हस्ताक्षर होने से इनकार नहीं किया था। साक्ष्य पूरा होने और मामला बहस के चरण में पहुंचने के बाद पहली बार हस्ताक्षर की जांच की मांग करना कार्यवाही में देरी करने की कोशिश है। मामला वर्ष 2022 में दर्ज शिकायत केस 2022 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता शैलेश कुमार ने नजीर अंसारी के खिलाफ चेक बाउंस की धारा 138 के तहत मामला दर्ज कराया था। आरोप है कि कानूनी देनदारी के भुगतान के लिए जारी 12.50 लाख रुपये का चेक संख्या 449083, दिनांक 17 जनवरी 2022 को बैंक में प्रस्तुत करने पर भुगतान नहीं हुआ। रिटर्न मेमो में चेक के अनादर का कारण पर्याप्त राशि नहीं होना और हस्ताक्षर का मेल नहीं खाना बताया गया था।
साक्ष्य पूरा होने के बाद मांगी एफएसएल जांच
आरोपी ने 19 मार्च 2026 को निचली अदालत में आवेदन देकर चेक को हस्तलेख विशेषज्ञ/एफएसएल भेजने की मांग की थी। निचली अदालत ने 7 मई 2026 को आवेदन खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ आरोपी ने न्यायिक आयुक्त की अदालत में आपराधिक पुनरीक्षण दायर किया था। न्यायिक आयुक्त ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि शिकायतकर्ता की गवाही हो चुकी थी और दस्तावेज बिना आपत्ति के प्रदर्श के रूप में स्वीकार किए जा चुके थे। आरोपी का बयान भी दर्ज हो चुका था और मामला बहस के लिए चल रहा था। इसके बाद आरोपी ने पहली बार चेक के हस्ताक्षर की जांच की मांग की।
शुरुआत से हस्ताक्षर पर कोई विवाद नहीं
अदालत ने कहा कि आरोपी के धारा 313 सीआरपीसी के बयान में भी चेक पर अपने हस्ताक्षर होने को लेकर कोई विवाद नहीं था। मुकदमे की शुरुआत से लेकर दस्तावेजों के प्रदर्श बनने तक आरोपी ने हस्ताक्षर को चुनौती नहीं दी। ऐसे में मुकदमे के अंतिम चरण में अचानक एफएसएल जांच की मांग का कोई उचित आधार नहीं है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Oriental Bank of Commerce बनाम प्रभोद कुमार तिवारी के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि चेक पर हस्ताक्षर होने के बाद धारा 139 के तहत उत्पन्न वैधानिक अनुमान को केवल हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट से खारिज नहीं किया जा सकता। इसलिए चेक को हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजना इस मामले में आवश्यक नहीं है।
मुकदमे में देरी को लेकर कोर्ट सख्त
न्यायिक आयुक्त ने कहा कि शीघ्र न्याय पाना मौलिक अधिकार है और देरी की रणनीति से न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास प्रभावित होता है। धारा 311 सीआरपीसी का इस्तेमाल कार्यवाही में देरी के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि आरोपी ने मुकदमे को टालने का प्रयास किया और निचली अदालत ने आवेदन को सही तरीके से खारिज किया था। इस आधार पर न्यायिक आयुक्त ने 7 मई 2026 के आदेश को बरकरार रखते हुए आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
एक माह में ट्रायल पूरा करने का निर्देश
अदालत ने विशेष रूप से कहा कि यह वर्ष 2022 का चेक बाउंस मामला है और ऐसे मामलों का शीघ्र निपटारा किया जाना चाहिए। न्यायिक आयुक्त ने निचली अदालत को आदेश की प्रति प्राप्त होने के एक माह के भीतर ट्रायल पूरा करने का प्रयास करने का निर्देश दिया। दोनों पक्षों को कार्यवाही में सहयोग करने को कहा गया है। जानबूझकर देरी करने पर निचली अदालत को कानून के तहत कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी गई है।

