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संविदा पर बहाल सहायक प्रोफेसर को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने कहा-उन्हें नहीं हटाया जा सकता

Assistant Professor Appointment झारखंड की तीन विश्वविद्यालयों में संविदा पर बहाल सहायक प्रोफेसर को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है।

Ranchi: Assistant Professor Appointment झारखंड की तीन विश्वविद्यालयों में संविदा पर बहाल सहायक प्रोफेसर को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जस्टिस डॉ एसएन पाठक की अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि संविदा के आधार पर पूर्व में की गई नियुक्ति को संविदा के आधार पर होने वाली नई नियुक्ति से रिप्लेस (हटाया) नहीं जा सकता है।

पूर्व में सभी पक्षों की सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला रख लिया था। सोमवार को अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत कोल्हान विश्वविद्यालय, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, विनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय में संविदा पर नियुक्त सहायक प्रोफेसर को नहीं हटाने का आदेश दिया है।

पिछली सुनवाई के दौरान वादियों की ओर से अधिवक्ता विकास कुमार व अपराजिता भारद्वाज ने अदालत को बताया कि इस तरह के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संविदा के आधार पर हुई नियुक्ति को संविधा के आधार पर नई नियुक्ति से नहीं हटा सकते हैं। बशर्ते की वह नियमित नियुक्ति हो।

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सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार बनाम पियारा सिंह के मामले में उक्त आदेश पारित किया है। वर्ष 2018 में झारखंड हाईकोर्ट ने भी रितेश कुमार बनाम झारखंड सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए आदेश पारित किया है। इस मामले में कोर्ट ने उक्त आदेश को माना है।

वहीं, राज्य सरकार और विश्वविद्यालयों की ओर से दाखिल शपथ पत्र में कहा गया है कि वर्ष 2017 से संविदा पर बहाल किए गए सहायक प्रोफेसर को नहीं हटाया जाएगा। बल्कि रिक्त अन्य पदों पर ही संविदा के आधार पर नियुक्ति की जाएगी। इसके बाद अदालत ने सात लोगों को नहीं हटाने का आदेश दिया किया है।

फिलहाल हाईकोर्ट में इसी तरह की 229 याचिकाएं सुनवाई के लिए लंबित हैं। दरअसल, मार्च 2017 सरकार ने संविदा पर सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति को लेकर एक संकल्प जारी किया था। इसके बाद राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में संविदा के आधार पर सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति की गई थी।

मार्च 2020 में फिर से सरकार ने फिर से संविदा पर ही सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति संकल्प जारी किया। इसमें कहा गया कि पूर्व में बहाल सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति तीन साल के लिए थी। इसलिए वे सभी भी नई बहाली में दोबारा आवेदन कर सकते हैं। सरकार के आदेश और विज्ञापन को हाईकोर्ट में चुनौती गई थी।

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