Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के मामले में एक अहम कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(3) के तहत एक ही डिफॉल्ट (बकाया) के लिए पति को बार-बार 30-30 दिनों के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस धारा के तहत अधिकतम सजा एक माह (30 दिन) ही है और एक ही डिफॉल्ट के लिए दोबारा या बार-बार जेल की सजा देना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने यह आदेश दुमका निवासी दसरथ सिंह की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Cr. Revision No. 738/2026) को स्वीकार करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट, दुमका के 16 अप्रैल 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसकी रिहाई की अर्जी खारिज कर दी गई थी और उसे बकाया भरण-पोषण न देने के कारण लगातार जेल में रखा गया था।
मामला क्या है?
याचिकाकर्ता दसरथ सिंह की पत्नी शंपू कुमारी ने वर्ष 2021 में मेंटेनेंस की अर्जी दाखिल की थी। फैमिली कोर्ट ने 31 मार्च 2023 को पति को पत्नी को 5,000 रुपये और बेटी को 3,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। भुगतान न करने पर पत्नी ने एनफोर्समेंट याचिका दायर की। पति को 27 अप्रैल 2024 को गिरफ्तार किया गया और तब से लगातार 23 बार 30-30 दिनों के लिए उसकी हिरासत बढ़ाई जाती रही, लेकिन उसे एक दिन के लिए भी रिहा नहीं किया गया।
हाईकोर्ट की टिप्पणी एवं फैसला:
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘शहादा खातून बनाम अमजद अली’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125(3) के तहत कारावास केवल एक दबावपूर्ण उपाय है और इसके तहत मजिस्ट्रेट को सजा देने की शक्ति एक माह से अधिक की नहीं है। भरण-पोषण की देयता बनी रहती है और पत्नी हर अलग-अलग डिफॉल्ट के लिए वसूली याचिका दायर कर सकती है, लेकिन एक ही डिफॉल्ट के लिए पति को लगातार या बार-बार कैद में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने फैमिली कोर्ट के 16 अप्रैल 2026 के आदेश को रद्द करते हुए दसरथ सिंह को तत्काल रिहा करने का आदेश जारी किया।

