कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: फर्म को पक्षकार न बनाना कोई तकनीकी बाधा नहीं; पार्टनर पर बनता है चेक बाउंस का आपराधिक मामला
Ranchi News: सिविल कोर्ट रांची की एक अदालत ने चेक बाउंस (धारा 138 एन.आई. एक्ट) के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने बोकारो स्टील सिटी निवासी आरोपी सुमित अग्रवाल (मेसर्स मेमसाहब, बोकारो के पार्टनर) को दोषी ठहराते हुए 6 माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही आरोपी को शिकायतकर्ता को 1,24,031 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया गया है। भुगतान न करने पर आरोपी को 2 माह की अतिरिक्त साधारण कैद भुगतनी होगी। इससे पूर्व, न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी)-IX, रांची (श्री मयंक मलियाज) की अदालत ने 08 अगस्त 2025 को आरोपी को बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता संतोष कुमार चौधरी ने आपराधिक अपील दाखिल की थी।
मामला क्या था?
मामला वर्ष 2018 का है। रांची स्थित ‘वैरायटी कलेक्शंस’ (वैरायटी टेक्सटाइल्स) के प्रोपराइटर संतोष कुमार चौधरी ने बोकारो स्टील सिटी स्थित कपड़ा दुकान ‘मेमसाहब’ के पार्टनर सुमित अग्रवाल के खिलाफ 75,000 रुपये का चेक बाउंस होने की शिकायत दर्ज कराई थी।
- चेक की विवरणी: पंजाब नेशनल बैंक (बोकारो) का चेक संख्या 282310, दिनांक 20.04.2018।
- अनादर का कारण: शिकायतकर्ता द्वारा आईडीबीआई बैंक (मुख्य शाखा, रांची) में चेक जमा करने पर ‘पेमेंट स्टॉप्ड बाय ड्रॉवर’ (दराज द्वारा भुगतान रोका गया) के कारण 12.07.2018 को चेक अनादरित हो गया।
- नोटिस और केस: लीगल नोटिस का संतोषजनक जवाब न मिलने पर 27.08.2018 को शिकायत केस (3600/18) दर्ज कराया गया।
सत्र अदालत के मुख्य बिंदु व कानूनी आधार
अपील की सुनवाई करते हुए न्यायिक आयुक्त की अदालत ने निचली अदालत के निष्कर्षों को त्रुटिपूर्ण पाया:
- पार्टनरशिप फर्म और पार्टनर की जिम्मेदारी: अदालत ने उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के महत्वपूर्ण फैसलों (धनासिंह प्रभु बनाम चंद्रशेखर, 2025 आदि) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यदि पार्टनरशिप फर्म को सीधे पक्षकार नहीं भी बनाया गया है, तब भी फर्म का अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (Authorized Signatory) होने के नाते पार्टनर व्यक्तिगत और संयुक्त रूप से उत्तरदायी होता है। फर्म को नामजद न करना एक सुधार योग्य त्रुटि (Curable Defect) है, जिसके आधार पर केस खारिज नहीं किया जा सकता।
- कानूनी पूर्वधारणा (Presumption under Sec 139 NI Act): अदालत ने माना कि चूंकि चेक पर हस्ताक्षर और राशि आरोपी द्वारा भरे जाने की बात स्वीकार की गई है, इसलिए धारा 118 एवं 139 के तहत यह माना जाएगा कि चेक वैध देनदारी के लिए दिया गया था। आरोपी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि चेक उससे जबरन लिया गया था।
- समय-सीमा का पालन: शिकायतकर्ता ने धारा 138 एवं 142 एन.आई. एक्ट के तहत लीगल नोटिस और परिवाद पत्र तय समय-सीमा के भीतर ही दाखिल किया था।
अदालत का अंतिम आदेश
अदालत ने आरोपी सुमित अग्रवाल को दोषी करार देते हुए 15 दिनों के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करने का निर्देश दिया है। तय समय में आत्मसमर्पण न करने पर निचली अदालत को आरोपी के खिलाफ सख्त कड़ा रुख अपनाते हुए वारंट व अन्य दंडात्मक कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है।

