Ranchi News: झारखंड की राजधानी रांची की एक अदालत ने खाद्य सुरक्षा और मिलावट से जुड़े मामलों में पुलिसिया हस्तक्षेप को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला कानूनी फैसला सुनाया है। Judicial Commissioner अनिल कुमार मिश्रा नंबर-1 की अदालत ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision No- 205 of 2026) पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) के पुराने आदेश को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने इस मामले को वापस निचली अदालत को भेजते हुए निर्देश दिया है कि कानून के स्थापित सिद्धांतों के तहत इस पर नए सिरे से सुनवाई कर उचित आदेश पारित किया जाए।
क्या है पूरा मामला? यह पूरा विवाद वर्ष 2017 से शुरू हुआ था, जो कोटवाली थाना (कांड संख्या 129/17 और जी.आर. केस संख्या 2807/17) में दर्ज पुलिस प्राथमिकी (FIR) से जुड़ा है। इस मामले में शिकायतकर्ता डॉ. सुजीत कुमार कश्यप ने राजकुमारी छपारिया (74 वर्ष), बिमला देवी, बीना छपारिया, कमल कुमार छपारिया और रोमित छपारिया समेत एक ही परिवार के कुल 14 लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने जांच के बाद इन सभी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी), 487/34 और खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (FSS Act) की धारा 57, 59 और 63 के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
निचली अदालत ने खारिज की थी डिस्चार्ज अर्जी पुलिस चार्जशीट के आधार पर कोर्ट ने संज्ञान (Cognizance) लिया था और मामला आरोपियों के खिलाफ आरोप तय (Framing of Charge) करने के चरण में था। इस बीच, आरोपियों की ओर से उनके वकील सौरभ राज ने निचली अदालत (CJM कोर्ट) में तीन अलग-अलग डिस्चार्ज याचिकाएं दाखिल कर केस से बरी करने की गुहार लगाई थी। लेकिन 25 मार्च 2026 को CJM कोर्ट ने इन याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि रिकॉर्ड पर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। निचली अदालत के इसी फैसले को आरोपियों ने रांची के न्यायिक आयुक्त की अदालत में चुनौती दी थी।
बचाव पक्ष की दलील: ‘लैब रिपोर्ट में नहीं मिली मिलावट’ पुनरीक्षण याचिका पर बहस के दौरान आरोपियों के वकील श्री सौरभ राज ने अदालत को बताया कि यह पूरी कानूनी प्रक्रिया कानून का दुरुपयोग है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकारी लैबोरेट्री (FSSAI Lab) की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि खाद्य पदार्थों के सभी सैंपल तय मानकों के अनुरूप थे और उनमें किसी भी तरह की मिलावट या हानिकारक केमिकल नहीं पाया गया था। बचाव पक्ष ने कहा कि लैबोरेट्री रिपोर्ट में केवल ‘मिसिंग कंज्यूमर इंफॉर्मेशन’ (जैसे बैच नंबर और FSSAI का लोगो न होना) की बात कही गई थी। यह केवल फूड सेफ्टी एक्ट की धारा 52 के तहत ‘गलत ब्रांडिंग या लेबलिंग की मामूली खामी’ (Labeling Lapse) का मामला बनता है, जिसके लिए जुर्माना लगाया जा सकता है, लेकिन यह IPC के तहत कोई गंभीर आपराधिक अपराध नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने दलील दी कि पुलिस ने जिन गवाहों के बयान दर्ज किए हैं, वे महज औपचारिक गवाह हैं और उनसे आरोपियों की किसी सीधी संलिप्तता की पुष्टि नहीं होती।
अदालत की बड़ी टिप्पणी: विशेष कानून के आगे IPC बेअसर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद न्यायिक आयुक्त अनिल कुमार मिश्रा नंबर-1 की अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों से सहमति जताई। अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले (निरंजन कुमार साह बनाम झारखंड राज्य, 2023) और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि:
“खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम (FSS Act), 2006 की धारा 42 के तहत केवल ‘फूड सेफ्टी ऑफिसर’ (खाद्य सुरक्षा अधिकारी) ही निरीक्षण करने, सैंपल लेने, उन्हें जांच के लिए भेजने और शिकायत दर्ज कराने के लिए अधिकृत व सक्षम प्राधिकारी हैं। कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि जब किसी मामले में कोई ‘विशेष अधिनियम’ (Special Act) मौजूद हो, तो वहां IPC (भारतीय दंड संहिता) के सामान्य प्रावधान लागू नहीं होते। ऐसे में इस मामले में पुलिस द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी (FIR) और की गई जांच कानूनी रूप से विचारणीय नहीं है।”
अदालत ने माना कि निचली अदालत (CJM कोर्ट) ने आदेश पारित करते समय कानून के इस अहम पहलू पर गंभीरता से विचार नहीं किया। लिहाजा, कोर्ट ने 25 मार्च 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया और केस रिकॉर्ड (LCR) को वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि दोनों पक्षों को दोबारा सुनकर कानून सम्मत नया आदेश जारी किया जाए। इस फैसले के बाद अब मिलावटखोरी या फूड पैकेट पर लेबलिंग से जुड़े मामलों में पुलिस की सीधी दखलअंदाजी और थानों में दर्ज होने वाली एफआईआर पर रोक लगेगी।

