Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड सशस्त्र पुलिस (जैप) के चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में 91 याचिकाकर्ताओं के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने सोनू कुमार एवं अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रार्थियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन कर्मचारियों को ‘दिकेश कुमार एवं अन्य’ के मामले में पूर्व में दिए गए फैसले के अनुरूप ही सभी लाभ प्रदान किए जाएं। इस आदेश के तहत कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्तगी की तिथि से लेकर पुनर्बहाली तक की अवधि यानी 23 जून 2016 से 22 जनवरी 2021 तक का बकाया वेतन और इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) का पूरा लाभ मिलेगा।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद वर्ष 2016 में जैप के चतुर्थवर्गीय (Class-IV) पदों पर हुई नियुक्तियों को अचानक रद्द किए जाने और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट के आदेश पर कर्मचारियों की दोबारा बहाली (पुनर्बहाली) से जुड़ा है।
नियुक्ति रद्द होना: वर्ष 2016 में नियुक्तियों को रद्द किए जाने के कारण ये कर्मचारी लंबे समय तक अपनी सेवा से बाहर रहने को मजबूर हुए थे।
पुनर्बहाली के बाद नया पेंच: बाद में न्यायालय के आदेश के बाद तो इन सभी कर्मचारियों की सम्मानजनक पुनर्बहाली हो गई, लेकिन राज्य सरकार ने सेवा से बाहर रहने की उस पूरी अवधि (लगभग साढ़े चार साल) का बकाया वेतन देने से साफ इनकार कर दिया था।
सरकार का तर्क: झारखंड सरकार की ओर से इस मामले में ‘नो वर्क, नो पे’ (काम नहीं तो वेतन नहीं) के सिद्धांत का हवाला दिया गया था।
कर्मचारियों की क्या थी मुख्य दलील?
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष जोरदार पक्ष रखते हुए दलील दी कि कर्मचारी अपनी मर्जी या स्वेच्छा से ड्यूटी से दूर नहीं थे।
अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार की ओर से ही नियुक्तियां रद्द की गई थीं, जिसकी वजह से वे काम पर उपस्थित नहीं हो सके। ऐसी स्थिति में प्रशासनिक त्रुटि या फैसले का खामियाजा और सेवा से बाहर रहने की अवधि का आर्थिक नुकसान कर्मचारियों पर डालना पूरी तरह अनुचित है। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने नो वर्क, नो पे के सिद्धांत को खारिज करते हुए बकाया वेतन, वार्षिक इंक्रीमेंट और अन्य सभी परिणामी सेवा लाभ दिलाने की मांग की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
कर्मचारियों के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
वित्तीय राहत: इस फैसले से 91 चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को लगभग 4.5 साल (2016 से 2021) की अवधि का रुका हुआ पूरा बकाया वेतन और वार्षिक इंक्रीमेंट मिल सकेगा।
न्याय की जीत: कोर्ट के इस रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि यदि प्रशासनिक या सरकार के गलत निर्णयों के कारण कर्मचारी सेवा से बाहर रहते हैं, तो ‘नो वर्क, नो पे’ का नियम उन पर जबरन लागू नहीं किया जा सकता, यदि इसमें कर्मचारियों की कोई गलती नहीं है।

