Ranchi News: हिंदू संगठनों से जुड़े भैरव सिंह के खिलाफ झारखंड अपराध अधिनियम (सीसीए) के तहत निरुद्ध किए जाने के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के ही भैरव सिंह को सीसीए के तहत निरुद्ध किया गया प्रतीत होता है। अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि महावीर मंदिर और काली मंदिर से जुड़े मामलों में पूर्व में स्वयं हाईकोर्ट ने कई जनहित याचिकाओं पर आदेश पारित किए हैं। ऐसे मामलों में क्षेत्राधिकार के विपरीत निरुद्ध आदेश पारित करना आपातकाल जैसी परिस्थितियों का संकेत देता है। प्रार्थी की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार और अभय मिश्र ने दलील दी कि भैरव सिंह कोई पेशेवर अपराधी नहीं हैं और उनके विरुद्ध झारखंड अपराध अधिनियम के तहत पारित निरुद्ध आदेश संविधान के प्रावधानों के विपरीत है। अधिवक्ताओं ने कहा कि भैरव सिंह पर दर्ज सभी मामले सनातन धर्म के समर्थन में किए गए धरना-प्रदर्शनों से जुड़े हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जिस आधार पर पूर्व में जिला बदर की कार्रवाई की गई थी, उसी आधार पर दोबारा निरुद्ध आदेश पारित नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार भैरव सिंह के खिलाफ सीसीए की धाराएं लागू ही नहीं होतीं।
मामले में यह भी बताया गया कि पहला मामला काली मंदिर और महावीर मंदिर में प्रतिबंधित मांस फेंके जाने के विरोध से जुड़ा था, लेकिन उस घटना में दोषियों को पकड़ने के बजाय तत्कालीन एसएसपी का तबादला कर दिया गया था। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि वादी ने झारखंड अपराध अधिनियम की धारा 12 के तहत पारित निरुद्ध आदेश को चुनौती दी है, लेकिन वादी द्वारा दाखिल बंदी आवेदन पर सरकार ने क्या निर्णय लिया, इसकी जानकारी भी उसे नहीं दी गई। इसके अलावा, वादी को तीन सप्ताह बाद निरुद्ध बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया गया और बोर्ड के निर्णय से भी उसे अवगत नहीं कराया गया। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब पूर्व में वादी को केवल 15 दिनों के लिए जिला बदर किया गया था, तो उसी आधार पर दोबारा निरुद्ध आदेश कैसे पारित किया जा सकता है। कोर्ट ने राज्य सरकार को इस मामले में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

