2017 में डीएमओ की मांग पर जमा किए थे 33.60 लाख और 2.08 करोड़ रुपये; दूसरे मामलों में 2025 में मांग रद्द होने के बाद refund लेने पहुंचे, कोर्ट ने माना ‘फेंस-सिटर’
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने खनन कारोबार से जुड़े दो मामलों में करीब 2.42 करोड़ रुपये की वापसी की मांग को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जिन लोगों ने 2017 में जिला खनन पदाधिकारी की ओर से जारी मांग को चुनौती नहीं दी और रकम जमा करने के बाद करीब नौ साल तक चुप बैठे रहे, वे अब दूसरे लोगों के मुकदमे का परिणाम अपने पक्ष में आने के बाद उसी राहत का दावा नहीं कर सकते।
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने विजय कुमार ओझा और अनिल खिरवाल की याचिकाएं गुरुवार, 10 सितंबर को खारिज कर दी। दोनों याचिकाकर्ताओं ने क्रमश: 33,60,863 रुपये और 2,08,39,666 रुपये वापस करने की मांग की थी। यह रकम जिला खनन पदाधिकारी, चाईबासा की ओर से 2017 में पर्यावरणीय स्वीकृति में निर्धारित सीमा से अधिक अयस्क खनन के आरोप में मुआवजे के रूप में मांगी गई थी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जिला खनन पदाधिकारी को खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 21(5) के तहत ऐसी मांग करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि राज्य सरकार ने धारा 26(2) के तहत उन्हें यह शक्ति नहीं सौंपी थी। उन्होंने बताया कि इसी आधार पर हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने 4 मार्च 2025 को समान मांग नोटिस रद्द कर दिए थे। राज्य सरकार की उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी भी 15 दिसंबर 2025 को खारिज हो गई थी।
लेकिन मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की देरी को निर्णायक माना। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने 2017 की मांग को कभी चुनौती ही नहीं दी, बल्कि रकम जमा करने के बाद लगभग नौ साल तक निष्क्रिय रहे। दूसरे खनन पट्टाधारकों के पक्ष में फैसला आने के बाद उन्होंने refund के लिए प्रतिनिधित्व दिया।
अदालत ने ऐसे लोगों को कानून की भाषा में ‘फेंस-सिटर’ बताया—अर्थात वे लोग जो खुद समय पर अदालत नहीं जाते, दूसरों के मुकदमे का परिणाम देखते हैं और सफलता मिलने पर उसी लाभ की मांग लेकर अदालत पहुंचते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी प्रवृत्ति को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। ‘देरी न्यायसंगत राहत को प्रभावित करती है’ और अधिकारों के प्रति सतर्क रहने वाले व्यक्ति को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि केवल किसी सरकारी आदेश को ‘शून्य’ या अधिकार-विहीन बताने से वह अपने आप अस्तित्वहीन नहीं हो जाता। किसी आदेश को तब तक प्रभावी माना जाता है, जब तक सक्षम अदालत उसे चुनौती के बाद रद्द न कर दे। इसलिए याचिकाकर्ताओं का यह तर्क कि मांग नोटिस शुरू से ही अधिकारहीन था और उसे अलग से चुनौती देने की जरूरत नहीं थी, अदालत ने स्वीकार नहीं किया।
फैसले का वास्तविक असर
- समान मामला होने मात्र से पुराने मामलों में स्वत: राहत नहीं मिलेगी।
- सरकारी मांग/आदेश गलत होने का दावा है तो उसे समय पर अदालत में चुनौती देना जरूरी है।
- दूसरे व्यक्ति की जीत का इंतजार कर बाद में राहत मांगने वालों को ‘फेंस-सिटर’ मानकर राहत से वंचित किया जा सकता है।
- करीब 2.42 करोड़ रुपये की refund मांग सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं हुई क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने 2017 की मांग को चुनौती नहीं दी।
- किसी आदेश को ‘void’ कह देना पर्याप्त नहीं; उसे सक्षम अदालत से चुनौती देकर निरस्त कराना होगा।
- फैसला प्रशासनिक आदेशों के खिलाफ समय पर न्यायिक चुनौती देने की जरूरत को रेखांकित करता है।

