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HC News: झारखंड हाईकोर्ट का सख्त निर्देश: बिना मंजूरी छुट्टी पर जाने की प्रथा पर रोक, कोर्ट परिसर की सुरक्षा से खिलवाड़ मंजूर नहीं

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By CourtNews Desk On 17 Aug, 2026
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धनबाद सिविल कोर्ट में चोरी के मामले में बर्खास्तगी से बचे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की याचिका खारिज; अदालत ने कहा— मौखिक आश्वासन के भरोसे ड्यूटी छोड़ना न्याय व्यवस्था के लिए खतरा

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने अदालतों में कर्मचारियों के बिना पूर्व स्वीकृति के केवल आवेदन देकर या मौखिक आश्वासन के भरोसे छुट्टी पर चले जाने की तथाकथित प्रथा पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसी कोई प्रथा अस्तित्व में है, तो उसे तत्काल समाप्त किया जाए। अदालत ने चेतावनी दी कि सुरक्षा गार्डों और कर्मचारियों द्वारा इस तरह अपनी ड्यूटी से नदारद होना जनहित के खिलाफ है और इससे अदालतों के कामकाज व सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ता है। यह आदेश धनबाद सिविल कोर्ट के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (नाइट गार्ड) विजय कुमार सिंह की याचिका को खारिज करते हुए जारी किया गया।

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क्या है पूरा मामला? मामला 20 और 21 मार्च 2011 की दरमियानी रात का है, जब धनबाद सिविल कोर्ट परिसर स्थित एक न्यायिक दंडाधिकारी के कार्यालय का ताला तोड़कर सीपीयू (CPU) और मॉनिटर चोरी कर लिया गया था। इसके अलावा अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश और स्टेनो के चैंबर के ताले भी टूटे पाए गए थे। जांच में पाया गया कि याचिकाकर्ता की ड्यूटी 20 मार्च को दोपहर 2:00 बजे से रात 10:00 बजे तक थी, लेकिन वह बिना किसी आधिकारिक मंजूरी के अपनी ड्यूटी से नदारद था। विभागीय जांच के बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ता की एक वेतनवृद्धि (Increment) रोकने और निलंबन अवधि का केवल जीवन निर्वाह भत्ता देने का आदेश जारी किया गया था। इस सजा के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

अदालत की सख्त टिप्पणियां याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अदालतों में आवेदन देकर या मौखिक आश्वासन पर छुट्टी पर जाने का चलन रहा है। इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

  • निचली अदालतों को निर्देश: हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया गया है कि वे इस आदेश की प्रति राज्य के सभी प्रधान जिला जजों को भेजें ताकि यदि ऐसी कोई प्रथा चल रही हो, तो उसे तुरंत रोका जा सके (सिवाय अत्यंत आपातकालीन परिस्थितियों के)।
  • सजा में राहत केवल मानवीय आधार पर: अदालत ने माना कि यह misconduct (दुराचरण) बहुत गंभीर था और इसके लिए इससे भी सख्त सजा मिलनी चाहिए थी। हालांकि, याचिकाकर्ता के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी होने और उसके परिवार (पत्नी व दो बच्चे) की स्थिति को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने सजा बढ़ाने की सिफारिश करने से परहेज किया।
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हाईकोर्ट ने याचिका को पूरी तरह से आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

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