Ranchi News: गढ़वा समेत राज्य के विभिन्न जिलों में मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों को सरकारी लाभ और मुआवजा न दिए जाने पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। गुरुवार को चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जताते हुए गढ़वा के वर्तमान और पूर्व उपायुक्त (DC) को 14 मई को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है।
प्रशासनिक सुस्ती पर अदालत की फटकार
घनश्याम पाठक द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि पूर्व में दिए गए स्पष्ट निर्देशों के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर केवल कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं। जमीनी स्तर पर मजदूरों को लाभ पहुँचाने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई। अदालत ने सरकार द्वारा दाखिल जवाब को पूरी तरह असंतोषजनक बताया।
क्या है याचिकाकर्ता की दलील?
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजीव कुमार ने पक्ष रखते हुए अदालत को बताया कि बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम के तहत मुक्त कराए गए मजदूरों को तत्काल मुआवजा, पुनर्वास और अन्य सरकारी सुविधाएं देने का कानूनी प्रावधान है।
मुख्य आरोप:
- सिर्फ फाइलों में कार्रवाई: गढ़वा की एक संस्था द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों से कई बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराकर वापस लाया गया, लेकिन प्रशासन ने उन्हें अब तक उनके हाल पर छोड़ रखा है।
- सुविधाओं का अभाव: मजदूरों को न तो आर्थिक सहायता मिली और न ही सरकारी योजनाओं से जोड़ा गया।
अदालत ने इस स्थिति को मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हुए जवाबदेह अधिकारियों की मौजूदगी अनिवार्य कर दी है। अब 14 मई को दोनों अधिकारियों को अदालत के समक्ष अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

