77 करोड़ जनता का पैसा, वसूली टालने के लिए कर्जदार ने चले कानूनी दांवपेच’ – अस्पताल प्रबंधन की चालाकी पर भड़का हाई कोर्ट।
Ranchi News: झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की एकल पीठ ने बैंकिंग और ऋण वसूली मामलों में एक दूरगामी महत्व का निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि डेट्स रिकवरी अपीलेट ट्रिब्यूनल (DRAT) के अध्यक्ष (चेयरमैन) अपनी प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल कर कोई न्यायिक या स्थगन (Stay) आदेश पारित नहीं कर सकते। अदालत ने कर्जदार अस्पताल प्रबंधन द्वारा वसूली प्रक्रिया को लटकाने के लिए अपनाई गई रणनीति की कड़ी निंदा की। साथ ही, इंडियन बैंक को सफल नीलामी खरीदार के पक्ष में तुरंत ‘सेल सर्टिफिकेट’ जारी करने का आदेश दिया है।
’77 करोड़ जनता का पैसा है, कानूनन वसूली जरूरी’
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि कर्जदार पर 77 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है। यह जनता का पैसा है, जिसे कानूनन वसूला जाना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने पाया कि कर्जदार ने लोन चुकाने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं किया, बल्कि केवल वसूली प्रक्रिया को टालने के लिए लगातार कानूनी दांवपेच अपनाए। यह आदेश अदालत ने ‘इंडियन बैंक बनाम मां ललिता हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड’ और नीलामी खरीदार ‘यशोदा हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर लिमिटेड’ द्वारा दायर दो अलग-अलग रिट याचिकाओं पर सुनवाई के बाद जारी किया।
क्या है पूरा मामला?
- लोन और NPA: देवघर स्थित मां ललिता हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने अस्पताल निर्माण के लिए इंडियन बैंक (पूर्व में इलाहाबाद बैंक) से करोड़ों का लोन लिया था। लोन न चुकाने पर 31 दिसंबर 2009 को इस खाते को एनपीए (NPA) घोषित कर दिया गया।
- समझौता भंग: साल 2015 में बैंक और अस्पताल के बीच समझौता हुआ और बैंक ने जब्त संपत्ति लौटा दी। लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने समझौते की शर्तों को पूरा नहीं किया, जिसके बाद बैंक ने करीब 70.92 करोड़ की बकाया राशि के लिए सरफेसी (SARFAESI) एक्ट के तहत दोबारा कार्रवाई शुरू की।
- 44.22 करोड़ की नीलामी: बैंक ने 7 अप्रैल 2026 को अस्पताल की संपत्तियों की नीलामी की। इस नीलामी में यशोदा हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर लिमिटेड 44.22 करोड़ रुपये की सबसे बड़ी बोली लगाकर विजेता बना और पूरी रकम बैंक में जमा कर दी।
DRAT के आदेश को हाई कोर्ट ने माना अधिकार क्षेत्र से बाहर
ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) रांची के बंद होने का फायदा उठाते हुए कर्जदार अस्पताल ने इलाहाबाद स्थित अपीलेट ट्रिब्यूनल (DRAT) का दरवाजा खटखटाया था। वहाँ DRAT के अध्यक्ष ने आरडीबी (RDB) एक्ट की धारा 17ए के तहत अपनी प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 10 अप्रैल 2026 को बैंक को नीलामी की रकम स्वीकार करने की अनुमति तो दी, लेकिन खरीदार को सेल सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक लगा दी थी।
हाई कोर्ट का अंतिम फैसला
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद DRAT के इस स्थगन आदेश को पूरी तरह अधिकार क्षेत्र से बाहर (Beyond Jurisdiction) माना। पीठ ने कहा:
- कर्जदार ने पहले हाई कोर्ट से राहत पाने के लिए 2 करोड़ रुपये जमा करने का आदेश माना नहीं था।
- इसके बाद चालाकी से डीआरएटी (DRAT) में बिना कोई प्री-डिपाजिट (अनिवार्य राशि) जमा किए स्थगन आदेश हासिल कर लिया, जो अनुचित है।
अदालत ने DRAT द्वारा 10 अप्रैल 2026 और 21 अप्रैल 2026 को जारी अंतरिम स्थगन आदेशों को पूरी तरह खारिज कर दिया। अब बैंक बिना किसी कानूनी बाधा के सफल खरीदार (यशोदा हॉस्पिटल) के पक्ष में सेल सर्टिफिकेट जारी कर सकेगा।

