Ranchi: झारखंड हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया है कि अगर दो वयस्कों के बीच सात वर्षों से अधिक समय तक सहमति से शारीरिक संबंध रहे हों और यह साबित न हो कि पुरुष की शुरू से ही शादी करने की मंशा नहीं थी तो इसे शादी के झूठे वादे पर किया गया दुष्कर्म (रेप) नहीं माना जा सकता।
झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की पीठ ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और गिरिडीह के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित संज्ञान आदेश सहित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद कर दिया।
कोर्ट ने आरोपी लालू महथा के खिलाफ दर्ज एफआईआर, संज्ञान आदेश समेत पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। मामला गिरिडीह महिला (सदर) थाना से जुड़ा है। पुलिस ने जांच के बाद आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। इसके आधार पर गिरिडीह के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने 16 अगस्त 2024 को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एन) के तहत संज्ञान लिया था। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
2016 में शादी समारोह में हुई थी दोनों की मुलाकात
प्राथमिकी के मुताबिक युवती और याचिकाकर्ता की मुलाकात 2016 में एक शादी समारोह के दौरान हुई थी जिसके बाद दोनों के बीच संबंध बने। शिकायत में कहा गया था कि 20 दिसंबर 2022 को आरोपी महिला को रांची लेकर आया। अगले दिन 21 दिसंबर को एक होटल में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
इसके बाद आरोपी ने उससे संबंध खत्म कर लिया। 2 अप्रैल 2023 को उसने अपना मोबाइल फोन भी बंद कर दिया। महिला ने जब आरोपी के पिता से संपर्क किया तो आरोप है कि आरोपी और उसके परिवार के सदस्यों ने शादी से इनकार कर दिया। इसके बाद महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
करीब सात साल तक संबंध में रहने के बाद अप्रैल 2023 में आरोपी ने अपना फोन बंद कर दिया और उसके परिवार वालों ने शादी से इनकार कर दिया। इसके बाद पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर धारा 376 के तहत चार्जशीट दाखिल की।
शुरुआत से शादी की नीयत नहीं होने का आरोप नहीं
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से कहा गया कि दोनों के बीच सात साल से अधिक समय तक संबंध रहा और महिला बालिग थी। ऐसे में यह सहमति से बना संबंध था। राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई विशिष्ट आरोप नहीं है कि आरोपी ने शुरुआत से ही महिला से शादी करने का इरादा नहीं रखा था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शादी का वादा तभी झूठा माना जाएगा, जब वादा करते समय ही उसे पूरा करने की नीयत नहीं हो और उसी झूठे वादे के आधार पर महिला को शारीरिक संबंध के लिए तैयार किया गया हो। बाद में शादी का वादा पूरा नहीं करना अपने आप में झूठा वादा नहीं माना जा सकता।
केवल शादी के वादे से मुकरना अपने आप में दुष्कर्म नहीं: अदालत
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शादी का वादा झूठा वादा तभी कहलाएगा जब वादा करते समय ही व्यक्ति की मंशा उसे पूरा करने की न हो और उसका मकसद केवल महिला को धोखे में रखकर संबंध बनाना हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल वादे से मुकर जाना झूठा वादा नहीं कहलाता. इस मामले में ऐसी कोई विशिष्ट शिकायत नहीं है कि याचिकाकर्ता की शुरुआत से ही शादी करने की नीयत नहीं थी।
अदालत ने कहा कि सात साल तक बिना किसी विरोध के बने शारीरिक संबंध स्पष्ट रूप से दो वयस्कों के बीच सहमति से बनाए गए संबंध को दर्शाते हैं. शादी से इनकार करने पर दर्ज कराई गई FIR के आधार पर इसे दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता।