Ranchi News: गुमला जिले से वर्ष 2018 में लापता हुई एक छह वर्षीय मासूम बच्ची को खोजने में नाकाम रहने और मामले को ठंडे बस्ते में डालने के मामले में गुरुवार को झारखंड हाईकोर्ट का अब तक का सबसे कड़ा रूप देखने को मिला। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत ने सुनवाई की प्रथम पाली (First Sitting) में राज्य पुलिस और प्रशासनिक ढुलमुल रवैये पर तीव्र नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary), गृह सचिव (Home Secretary) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को दोपहर 2.15 बजे व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का समन जारी कर दिया। कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद दोपहर को ये तीनों शीर्ष अधिकारी अदालत में सशरीर उपस्थित हुए।
सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी (SLP) वापस लेने पर कोर्ट के तीखे सवाल:
हाईकोर्ट ने पूर्व में आदेश दिया था कि वर्ष 2018 से 2023 के बीच गुमला जिले में जितने भी पुलिस अधीक्षक (SP) पदस्थापित रहे हैं, उनकी कार्यशैली और इस मामले की जांच के तरीके की उच्च स्तरीय जांच की जाए। गुरुवार को खंडपीठ ने अधिकारियों से तीखा सवाल पूछा कि जब अदालत ने जांच के निर्देश दिए थे, तो राज्य सरकार को उस आदेश को चुनौती देने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी? क्या सरकार अपने अधिकारियों को बचाना चाहती है? इस पर मुख्य सचिव ने अदालत के समक्ष सरकार की ओर से गहरी संवेदना और खेद व्यक्त करते हुए जानकारी दी कि राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई उस एसएलपी को अब वापस (Withdraw) ले लिया गया है।
‘अधिकारियों का मनोबल’ बनाम ‘पीड़ितों को न्याय’ पर अदालती टिप्पणी:
सुनवाई के दौरान मुख्य सचिव ने अदालत से आग्रह करते हुए कहा कि इस प्रकार सीधे आईपीएस (IPS) अधिकारियों की जांच कराने से पुलिस बल और अधिकारियों का मनोबल (Morale) प्रभावित होता है। इस दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बेहद तल्ख टिप्पणी की: