Ranchi News: सिविल कोर्ट रांची के अपर न्यायायुक्त (XX) अरविन्द कुमार नंबर-2 की अदालत ने नौ वर्षीय बच्ची के अपहरण से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले के नामजद आरोपी जगदीश साहू (46 वर्ष) को साक्ष्य के अभाव में धारा 363 और 364 आईपीसी के आरोपों से पूरी तरह दोषमुक्त (Acquitted) करते हुए जेल से अविलंब रिहा करने का आदेश जारी किया है। आरोपी पिछले दो साल से अधिक समय (2 वर्ष, 1 महीना, 11 दिन) से न्यायिक हिरासत में जेल में बंद था।
क्या था पूरा मामला?
मामला सुखदेवनगर (पंडरा ओ०पी०) थाना कांड संख्या-XXX/2024 से संबंधित है। सूचक अनूप साहू ने 17 मई 2024 को प्राथमिकी दर्ज कराई थी कि उनकी 9 वर्षीय बेटी संध्या 4 बजे ट्यूशन जाने के लिए घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। उन्होंने आशंका जताई थी कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने उनकी बेटी का हत्या के उद्देश्य से अपहरण कर लिया है। हालांकि, उसी रात बच्ची मांडर इलाके में सकुशल मिल गई थी। पुलिस ने बाद में मांडर निवासी जगदीश साहू को आरोपी बनाते हुए चार्जशीट दाखिल की थी।
अभियोजन पक्ष की गंभीर लापरवाही आई सामने
मुकदमे की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) अपने आरोपों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। इस मामले में कई गंभीर कानूनी और प्रक्रियात्मक खामियां देखी गईं:
- मुख्य गवाहों को नहीं किया पेश: अभियोजन पक्ष ने कोर्ट के समक्ष न तो मुख्य शिकायतकर्ता (पिता) को और न ही पीड़ित बच्ची को गवाही के लिए पेश किया।
- आईओ की गवाही भी नहीं: मामले के मुख्य गवाह यानी अनुसंधानकर्ता (Investigating Officer) का भी कोर्ट में बयान दर्ज नहीं कराया जा सका, जिससे घटना की संपुष्टि नहीं हो पाई।
- गवाहों के बयान में विरोधाभास: कोर्ट में केवल दो गवाहों— पीड़िता की मां (P.W. 1) और मकान मालिक (P.W. 2) का परीक्षण कराया गया। जिरह के दौरान पीड़िता की मां ने खुद स्वीकार किया कि उसकी बेटी ट्यूशन से निकलने के बाद रास्ता भटक गई थी और उसे कोई उठाकर नहीं ले गया था। उन्होंने यह भी कहा कि वे इस मुकदमे के बारे में कुछ नहीं जानतीं और न ही आगे केस लड़ना चाहती हैं।
“शक कभी भी सबूत की जगह नहीं ले सकता”— कोर्ट
अदालत ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय (A.I.R. 1971 SC 1898) के न्यायिक दृष्टांत का हवाला देते हुए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कानून में ‘शक’ कभी भी ठोस साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता। अभियोजन को अपना मामला हर हाल में संदेह से परे साबित करना होता है। चूंकि इस केस में आरोपी की संलिप्तता पूरी तरह संदिग्ध पाई गई, इसलिए अदालत ने जगदीश साहू को ससम्मान बरी करने का फैसला सुनाया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता किसलय प्रसाद ने पैरवी की थी।