बड़ी राहत: बरियातू के सऊद अख्तर की क्रिमिनल रिवीजन याचिका की मंजूर
सहमति: 12 साल पुराने मामले में दोनों पक्षों के बीच हो चुका है समझौता, कोर्ट ने एक सप्ताह में सरेंडर कर केस निष्पादित करने का दिया निर्देश
- कानूनी चूक: निचली अदालत ने बिना गैर-जमानती वारंट (NBW) की तामिला रिपोर्ट के ही जारी कर दिया था धारा 82 (फरारी की उद्घोषणा) का आदेश।
- हाईकोर्ट का हवाला: अदालत ने कहा- आरोपी के फरार होने की संतुष्टि दर्ज किए बिना प्रक्रिया शुरू करना कानूनन सही नहीं।
Ranchi News: राजधानी के बरियातू थाना क्षेत्र के एक पुराने मामले में आरोपी सऊद अख्तर को रांची के न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा प्रथम की अदालत से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने निचली अदालत (JMFC) द्वारा आरोपी के खिलाफ जारी की गई धारा 82 (फरारी की उद्घोषणा) की प्रक्रिया को पूरी तरह त्रुटिपूर्ण मानते हुए निरस्त (Set-aside) कर दिया है।
अदालत ने क्रिमिनल रिवीजन याचिका संख्या 215/2026 पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि कानूनन बिना वारंट की तामिला रिपोर्ट प्राप्त किए या आरोपी के जानबूझकर फरार होने की ठोस संतुष्टि दर्ज किए बिना ऐसी सख्त कार्रवाई नहीं की जा सकती।
क्या था पूरा मामला और कानूनी पेंच?
यह मामला साल 2014 का है (बरियातू थाना कांड संख्या 455/14, जीआर केस नंबर 6259/14)। इसमें जोरा तालाब, कैसर कॉलोनी निवासी सऊद अख्तर आरोपी हैं। निचली अदालत ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया था। लेकिन, पुलिस द्वारा उस वारंट को तामिल कराने या उसकी रिपोर्ट अदालत को सौंपने से पहले ही निचली अदालत ने आरोपी के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 के तहत फरारी का नोटिस जारी कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ आरोपी ने अधिवक्ता संजीदा परवीन के माध्यम से रिवीजन याचिका दाखिल की थी।
बचाव पक्ष की दलील और हाईकोर्ट की नजीर
सुनवाई के दौरान पुनरीक्षणकर्ता (Revisionist) की अधिवक्ता सुश्री संजीदा परवीन ने दलील दी कि निचली अदालत का आदेश पूरी तरह गैर-कानूनी है क्योंकि रिकॉर्ड पर वारंट की कोई एग्जीक्यूशन रिपोर्ट ही नहीं थी। उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट द्वारा ‘मोहम्मद रुस्तम आलम बनाम झारखंड राज्य’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि धारा 82 की प्रक्रिया शुरू करने से पहले अदालत को अपनी लिखित संतुष्टि दर्ज करनी होगी कि आरोपी वाकई जानबूझकर छिप रहा है।
जांच और अदालती आदेश की मुख्य बातें:
- अदालत की टिप्पणी: न्यायिक आयुक्त ने पाया कि निचली अदालत ने कानून के स्थापित सिद्धांतों और हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों की अनदेखी की।
- केस का स्टेटस: चूंकि यह मामला साल 2014 का है और दोनों पक्षों के बीच अब आपसी समझौता (Compromise) हो चुका है, इसलिए अदालत ने इस मामले को जल्द खत्म करने का रास्ता साफ किया।
एक सप्ताह में सरेंडर और उसी दिन फैसले का निर्देश
अदालत ने मामले को सुलझाते हुए क्रिमिनल रिवीजन को स्वीकार कर लिया। चूंकि मामला आपस में सुलझ चुका है, इसलिए अदालत ने आरोपी सऊद अख्तर को आदेश की प्रति मिलने के एक सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण (Surrender) करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित निचली अदालत को आदेश दिया है कि दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर उसी दिन (Same Day) इस पूरे मामले का अंतिम रूप से निष्पादन (Dispose of) कर दिया जाए।