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Court News: नो एविडेंस, रंगदारी एवं आर्म्स एक्ट के 12 साल पुराने मामले में आरोपी राजेश खलखो बरी

CourtNews Desk
By CourtNews Desk On 19 Aug, 2026
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अभियोजन पक्ष की ओर से एक भी गवाह पेश न होने पर अदालत ने सुनाया फैसला

Ranchi News: सिविल कोर्ट रांची के न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी (JMFC) एंजेलिना जॉन की अदालत ने रंगदारी मांगने और फायरिंग करने के 12 साल पुराने एक मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी राजेश खलखो उर्फ राजेश उरांव को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है। अदालत ने मामले को “कोई साक्ष्य नहीं” (Case of No Evidence) मानते हुए आरोपी को IPC की धारा 147, 148, 149, 385, 387 और 27 आर्म्स एक्ट के आरोपों से मुक्त कर दिया।

क्या था मामला?

यह मामला रातू थाना (कांड संख्या 24/2014) में सूचक संतोष जायसवाल के लिखित बयान पर 21 जनवरी 2014 को दर्ज किया गया था। आरोप के अनुसार:

  • 21 जनवरी 2014 को सुबह करीब 9:31 बजे आरोपी राजेश खलखो ने सूचक के मोबाइल पर कॉल कर रंगदारी की मांग की।
  • उसी दिन दोपहर 3:00 बजे आरोपी अपने 9-10 साथियों के साथ सूचक के निर्माणाधीन मकान पर पहुंचा और मजदूरों से रंगदारी मांगी।
  • शाम 5:45 बजे आरोपी पुनः हथियार के साथ वहां पहुंचा। जब सूचक ने एसएसपी रांची को फोन किया, तो आरोपी और उसके साथी भागने लगे। भागते समय आरोपी द्वारा एक राउंड फायरिंग करने का भी आरोप लगाया गया था।
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अदालत की कार्रवाई और फैसला

पुलिस ने जांच के बाद 25 मार्च 2014 को आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया था, जिसके बाद 3 अप्रैल 2014 को अदालत द्वारा आरोप तय किए गए।

  • गवाहों की गैरहाजिरी: सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कई बार समन जारी होने और एसएसपी को पत्र लिखे जाने के बावजूद एक भी गवाह अदालत में पेश नहीं हुआ।
  • अनुपस्थिति में सुनवाई: सुनवाई के दौरान आरोपी के लगातार अनुपस्थित रहने पर 7 अप्रैल 2026 को अदालत ने उसके खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 299(1)(A) के तहत इन-एब्सेंशिया (अनुपस्थिति में) सुनवाई का आदेश दिया और विधिक सहायता के लिए लीगल एड डिफेंस काउंसिल (LADC) के वकील नियुक्त किए।
  • साक्ष्य का अभाव: 23 जुलाई 2026 को अभियोजन साक्ष्य बंद कर दिया गया। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर आरोपी के खिलाफ रंगदारी मांगने या फायरिंग करने का कोई भी कानूनी साक्ष्य मौजूद नहीं है।
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अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है, इसलिए आरोपी को सभी आरोपों से बरी किया जाता है।

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