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Court News: हाई कोर्ट ने कहा- जमानत मिलने के बाद तब तक रद नहीं हो सकती, जबतक कि जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं हुआ हो

Devesh Ananad
By Devesh Ananad On 31 May, 2024
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Court News: झारखंड हाई कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है कि अगर किसी अभियुक्त को एक बार जमानत दे दिया जाता है, उसकी जमानत तब तक रद नहीं की जा सकती जब तक कि वह जमानत की शर्तों का उल्लंघन न करे या निष्पक्ष सुनवाई में बाधा न डाले। अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में इस सिद्धांत को बरकरार रखा है कि केवल समझौता समझौते की शर्तों का पालन न करने के कारण जमानत रद नहीं की जा सकती।

जमशेदपुर सिविल कोर्ट ने दीक्षा कुमारी को एक आपराधिक मामले में आपसी समझौते के आधार पर जमानत दी थी. जिसके खिलाफ अमित कुमार ने हाई कोर्ट में क्रिमिनल मिस्लीनियस पिटीशन दाखिल कर जमानत रद करने का आग्रह किया था। इस मामले की सुनवाई हाई कोर्ट के जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की कोर्ट में हुई। याचिकाकर्ता ने जमशेदपुर के सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को रद करने की मांग की, जिसमें अमित कुमार रजक को दी गई जमानत रद करने के उद्देश्य से एक आपराधिक पुनरीक्षण को खारिज कर दिया गया था।

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प्रार्थी की जमानत रद हो

कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता ओर से तर्क दिया कि अमित कुमार रजक दीक्षा कुमारी को उनके वैवाहिक घर में वापस जाने की अनुमति न देने के कारण उनकी जमानत रद की जानी चाहिए। प्रदीप्ति ने भूरी बाई बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए मामले की निष्पक्ष सुनवाई पर अभियुक्त के कार्यों के प्रभाव पर विचार करने के महत्व पर जोर दिया।

विशेष लोक अभियोजक और प्रार्थी अमित कुमार के अधिवक्ता ने अपने रुख का समर्थन करने के लिए कई कानूनी मिसालों का हवाला दिया। उन्होंने अजय कुमार बनाम झारखंड राज्य, ज्योत्सना शर्मा बनाम झारखंड राज्य और अन्य, दोलत राम और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और बिमान चटर्जी बनाम संचिता चटर्जी और अन्य के मामलों का हवाला दिया।

न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी ने फैसला सुनाते हुए दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत तर्कों का विश्लेषण किया। प्रीतपाल सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि केवल समझौते की शर्तों का पालन न करने के आधार पर जमानत रद नहीं की जा सकती। उन्होंने आगे इस बात पर जोर दिया कि जमानत केवल तभी रद की जा सकती है जब आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया हो या निष्पक्ष सुनवाई में बाधा उत्पन्न की हो।

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न्यायमूर्ति चौधरी ने दोहराया, “किसी आरोपी व्यक्ति को एक बार दी गई जमानत तब तक रद नहीं की जा सकती जब तक कि वह जमानत की शर्तों का उल्लंघन न करे या संबंधित मामले की निष्पक्ष सुनवाई में बाधा उत्पन्न करने वाला कोई कार्य, काम या बात न करे।”

न्यायालय ने कानूनी मिसालों का हवाला देते हुए और दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत तर्कों पर सावधानीपूर्वक विचार करते हुए अंततः निष्कर्ष निकाला कि सत्र न्यायाधीश ने आपराधिक पुनरीक्षण को खारिज करने में कोई गलती नहीं की थी। इसलिए न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले की पुष्टि करते हुए आपराधिक याचिका को खारिज कर दिया।

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देवेश आनंद को पत्रकारिता जगत का 15 सालों का अनुभव है। इन्होंने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में काम किया है। अब वह इस वेबसाइट से जुड़े हैं।

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