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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- लीव-इन-रिलेशनशिप में रहने वालों के बीच बने शारीरिक संबंध को क्या दुष्कर्म माना जाए

अदालत ने दुष्कर्म के आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक जोड़ा यदि पति-पत्नी की तरह रह रहा है तो पति निर्मम हो सकता है, लेकिन उन दोनों के बीच बने संबंधों को क्या दुष्कर्म ठहराया जा सकता है।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए सवाल उठाया कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंधों को क्या दुष्कर्म माना जाए। अदालत ने दुष्कर्म के आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक जोड़ा यदि पति-पत्नी की तरह रह रहा है तो पति निर्मम हो सकता है, लेकिन उन दोनों के बीच बने संबंधों को क्या दुष्कर्म ठहराया जा सकता है।

चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एसए बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रह्मण्यन की पीठ दुष्कर्म मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा एफआईआर खारिज न किए जाने के निर्णय खिलाफ दाखिल अर्जी पर सुनवाई कर रही थी। यह मामला उप्र के गौतम बुद्ध नगर का है।

शिकायत कर्ता के वकील ने दिया ये दलील

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये हो रही सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता महिला के वकील ने कहा कि शारीरिक संबंध बनाने के लिए धोखा देकर उनके मुवक्किल से सहमति ली गई, जो स्वाभाविक सहमति नहीं थी। वकील ने कहा कि आरोपित युवक महिला को मनाली में एक मंदिर ले गया और शादी की रस्म पूरी। इस पर पीठ ने कहा कि शादी का झूठा वादा करना गलत है। किसी महिला को भी यह वादा करके नहीं तोड़ना चाहिए।

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इस पर आरोपित की ओर से पेश हुई वकील विभा दत्ता मखीजा ने कहा कि यह जोड़ा दो साल तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहा। अब वह महिला शादी का वादा कर दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगा रही है। वकील ने कहा कि मेरे मुवक्किल को परेशान करने के लिए एफआइआर में धारा 376 भी जुड़वा दी गई। इस पर महिला की ओर से पेश वकील ने कहा कि आरोपित उनकी मुवक्किल के साथ दो साल तक पति की तरह रहा फिर उसने किसी और से शादी कर ली। महिला के शारीरिक शोषण की बात मेडिकल रिपोर्ट से भी साबित होती है।

आरोपी के वकील की दलील

इस पर आरोपी की वकील ने कहा कि महिला अपने कार्यालय के दो और लोगों पर इस तरह के आरोप लगा चुकी है। वह आदतन यह काम करती है। इस पर पीठ ने वकील को टोकते हुए कहा कि किसी दुष्कर्म पीडि़ता पर इस तरह के आक्षेप लगाने को यह कोर्ट पहले ही अनुचित ठहरा चुकी है।

इसके बाद कोर्ट ने वकील को यह विशेष अनुमति याचिका वापस लेकर संबंधित कोर्ट में आरोपमुक्त करने की अर्जी देने को कहा। वकील के सहमति जताने पर पीठ ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपित की गिरफ्तारी पर आठ सप्ताह की रोक रहेगी। इसके बाद ट्रायल कोर्ट आरोपित की जमानत को लेकर कोई निर्णय लेगा। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

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