हाईकोर्ट ने अपील दाखिल करने में हुई देरी माफ करने से किया इनकार, सरकार की अर्जी खारिज
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने अपील दाखिल करने में हुई 262 दिन की देरी पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए देरी माफी की अर्जी खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि सरकार ने देरी के प्रत्येक चरण का संतोषजनक और लगातार स्पष्टीकरण नहीं दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि महज सरकारी विभागों में फाइल का इधर-उधर घूमना देरी माफ करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
मामला एकल पीठ के 16 अगस्त 2024 के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की ओर से दायर एलपीए से संबंधित था। सरकार ने अपील दाखिल करने में हुई 262 दिन की देरी को माफ करने की मांग की थी। अदालत ने पाया कि फैसले के बाद विभाग ने पहली कार्रवाई 27 अगस्त 2024 को की। इसके बाद भी फाइल कई दिनों तक निदेशालय और अधिकारियों के बीच घूमती रही। 15 सितंबर 2024 को अपील की निर्धारित अवधि समाप्त हो गई, लेकिन उससे पहले सरकार की ओर से कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।
17 दिन, 22 दिन और पांच दिन के अंतराल का नहीं मिला जवाब
खंडपीठ ने विभागीय प्रक्रिया के दौरान कई ऐसे अंतराल चिह्नित किए, जिनका सरकार संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी। 27 सितंबर से 14 अक्टूबर 2024 तक 17 दिन, 24 नवंबर से 16 दिसंबर तक 22 दिन और अन्य कई मौकों पर पांच-पांच दिन तक फाइल की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। अदालत ने कहा कि केवल यह बताना कि फाइल एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के पास गई, देरी का कारण नहीं माना जा सकता।
महाधिवक्ता ने कहा- अपील करें, फिर भी 122 दिन इंतजार
अदालत ने देरी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर विशेष टिप्पणी की। महाधिवक्ता ने 4 फरवरी 2025 को स्पष्ट राय दी थी कि अपील दाखिल की जाए। इसके बावजूद सरकार ने अपील दाखिल करने में और 122 दिन लगा दिए। अपील अंततः 6 जून 2025 को दाखिल की गई। खंडपीठ ने कहा कि महाधिवक्ता की राय के बाद अपील को लेकर कोई असमंजस नहीं रह गया था, इसलिए इसके बाद हुई 122 दिन की देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Postmaster General बनाम Living Media India Limited, Union of India बनाम Jahangir Byramji Jeejeebhoy और Shivamma बनाम Karnataka Housing Board के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सीमा कानून सरकार पर भी उतना ही लागू होता है जितना किसी निजी पक्ष पर। अदालत ने कहा कि संवैधानिक अदालतों को सरकारी लापरवाही और सुस्ती को वैधता नहीं देनी चाहिए।
खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार फाइल 30 से अधिक बार एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के पास गई, लेकिन इससे देरी स्वतः जायज नहीं हो जाती। अदालत ने 262 दिन की देरी माफ करने की अर्जी खारिज कर दी। इसके साथ ही संबंधित अपील और उससे जुड़ी अन्य अर्जियां भी समाप्त हो गईं।

