Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने दहेज प्रताड़ना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि आईपीसी की धारा 498ए के तहत क्रूरता साबित करने के लिए यह जरूरी नहीं कि महिला से मांगी गई रकम को दहेज की मांग कहा जाए। किसी महिला से गैरकानूनी रूप से संपत्ति या पैसे की मांग कर उसे पूरा कराने के लिए मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है तो यह भी धारा 498ए के तहत क्रूरता का अपराध है।
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने पूर्वी सिंहभूम की अनीता भकत की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने अपीलीय अदालत के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पति समेत ससुराल पक्ष के तीन आरोपियों को बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को बहाल करते हुए तीनों आरोपियों को दो महीने के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में सरेंडर कर सजा भुगतने का निर्देश दिया है।
कारोबार के लिए मांगे थे एक लाख
अनीता की शादी 25 जून 2008 को गौरांग भकत से हुई थी। आरोप के अनुसार शादी के बाद मायके वालों ने एक लाख रुपये नकद, सोने के आभूषण और करीब तीन लाख रुपये का घरेलू सामान दिया था। शादी के बाद पति ने चावल का कारोबार करने के लिए हॉलेर मशीन खरीदने के नाम पर मायके से एक लाख रुपये लाने की मांग की। मांग पूरी नहीं होने पर उसे प्रताड़ित किया गया। गर्भावस्था के दौरान मारपीट और इलाज नहीं कराने का भी आरोप लगाया गया। एक मार्च 2009 को फिर एक लाख रुपये की मांग की गई। रकम नहीं मिलने पर जान से मारने की धमकी देकर मारपीट की गई और उसे घर से निकाल दिया गया।
अपीलीय अदालत के तर्क को हाईकोर्ट ने नकारा
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को धारा 498ए और 323 के तहत दोषी ठहराया था। अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए उन्हें बरी कर दिया था कि एक लाख रुपये की मांग कारोबार बढ़ाने के लिए की गई थी, इसलिए इसे दहेज की मांग नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि धारा 498ए का दायरा केवल दहेज की मांग तक सीमित नहीं है। गैरकानूनी संपत्ति या मूल्यवान वस्तु की मांग पूरी कराने के लिए महिला को प्रताड़ित करना भी क्रूरता है। अदालत ने माना कि इस मामले में एक लाख रुपये की मांग गैरकानूनी थी और मांग पूरी कराने के लिए अनीता को शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
दो महीने में सरेंडर नहीं किया तो गिरफ्तारी
हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों को दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। ऐसा नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट को उनकी गिरफ्तारी कर जेल भेजने की कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है।