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Jharkhand News/H Court: हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसलाः अवैध बिजली ड्यूटी वृद्धि रद्द, उपभोक्ताओं को रिफंड का आदेश, 2021 का संशोधन अधिनियम असंवैधानिक घोषित

CourtNews Desk
By CourtNews Desk On 06 Jan, 2026
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Ranchi News: झारखंड के औद्योगिक और बिजली क्षेत्र को बड़ी राहत देते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने झारखंड विद्युत शुल्क (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 2021 तथा उससे जुड़े विद्युत शुल्क नियम, 2021 को असंवैधानिक और मनमाना करार देते हुए रद्द कर दिया है। यह फैसला चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने मेसर्स पाली हिल ब्रुअरीज प्राइवेट लिमिटेड समेत 30 से अधिक याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के बाद दिया। इन याचिकाओं में बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों, कैप्टिव पावर उत्पादकों, स्टील और खनन कंपनियों तथा औद्योगिक संगठनों ने राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.एस. मित्तल के साथ सलोना मित्तल और लवण्या मित्तल ने अदालत में पक्ष रखा। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार ने मूल कानून बिहार विद्युत शुल्क अधिनियम, 1948 (जिसे झारखंड ने अपनाया है) की चार्जिंग धारा में संशोधन किए बिना ही बिजली शुल्क की गणना की पद्धति बदल दी।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि बिजली शुल्क केवल खपत या बिक्री की गई बिजली की यूनिट के आधार पर ही लगाया जा सकता है। “नेट चार्जेज” के आधार पर शुल्क लगाने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है और न ही इस शब्द की परिभाषा कानून में दी गई है, जिससे यह व्यवस्था अस्पष्ट और मनमानी बन जाती है। अदालत ने यह भी कहा कि नई व्यवस्था के कारण एक मामले में किसी औद्योगिक उपभोक्ता पर बिजली शुल्क में करीब 1000 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो गई थी, जो न्यायसंगत नहीं है। खंडपीठ ने उस प्रावधान को भी निरस्त कर दिया, जिसके तहत राज्य सरकार को अधिसूचना जारी कर बिजली शुल्क की दरें बदलने का अधिकार दिया गया था। अदालत ने इसे बिना स्पष्ट नीति के विधायी शक्तियों का अत्यधिक हस्तांतरण बताया और कहा कि टैरिफ से बिजली शुल्क को जोड़ना समान परिस्थितियों वाले उपभोक्ताओं के बीच असमानता पैदा करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। हालांकि, कोर्ट ने झारखंड विद्युत शुल्क (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 2021 को वैध ठहराया है। इस संशोधन के तहत कैप्टिव पावर प्लांट्स पर 17 फरवरी 2022 से 50 पैसे प्रति यूनिट की दर से बिजली शुल्क लगाया गया है। अदालत ने कहा कि कर की दर तय करना राज्य की आर्थिक नीति का विषय है और जब तक उसमें संवैधानिक उल्लंघन न हो, न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। इस फैसले को उद्योग और बिजली उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।

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