Ranchi News: झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) कानून के प्रभावी क्रियान्वयन में हो रही लापरवाही को लेकर राज्य सरकार और उद्योग विभाग पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि राज्य में संचालित सभी औद्योगिक इकाइयों को 30 जून 2026 तक उद्योग विभाग में अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह आदेश सभी पुरानी इकाइयों पर लागू होगा, जबकि नई औद्योगिक इकाइयों को स्थापना के समय ही पंजीकरण कराना होगा। अदालत ने उद्योग विभाग के निदेशक को निर्देश दिया कि इस आदेश को सभी संबंधित विभागों और औद्योगिक इकाइयों तक तत्काल भेजा जाए। मामले की अगली सुनवाई 30 जनवरी को निर्धारित की गई है। यह आदेश पंकज कुमार द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अपराजिता भारद्वाज ने अदालत को बताया कि होम गार्ड्स को अब तक ईपीएफ का लाभ नहीं दिया जा रहा है, जबकि यह कानूनी रूप से अनिवार्य है।
ईपीएफ लाभ में देरी पर सरकार की भूमिका पर सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कर्मचारियों को ईपीएफ का लाभ देने में राज्य सरकार गंभीर नहीं है। ठेका कर्मियों, दैनिक मजदूरों और आकस्मिक कर्मचारियों को ईपीएफ के दायरे में लाने का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा गया था, लेकिन चार महीने बीतने के बावजूद उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। कोर्ट ने इसे राज्य सरकार की बड़ी लापरवाही करार दिया।
पंजीकरण के आंकड़ों पर कोर्ट हैरान
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पूरे झारखंड में केवल 1324 औद्योगिक इकाइयां ही उद्योग विभाग में पंजीकृत हैं, जिनमें से मात्र 231 इकाइयां ईपीएफ अधिनियम के अंतर्गत आती हैं। कोर्ट ने इसे चिंताजनक बताते हुए कहा कि पंजीकरण की कमी के कारण ईपीएफ कानून का सही ढंग से पालन नहीं हो पा रहा है। उद्योग विभाग ने कोर्ट को बताया कि पहले पंजीकरण अनिवार्य नहीं था, लेकिन अब इसे अनिवार्य बना दिया गया है। इस दौरान उद्योग विभाग के निदेशक विशाल सागर कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। उनके स्पष्टीकरण के बाद अदालत ने उनके खिलाफ चल रही अवमानना की कार्रवाई को निरस्त कर दिया और व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट प्रदान कर दी।

