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High Court News: पत्नी को आग लगाकर मारने वाले पति की उम्रकैद की सजा High Court ने रखी बरकरार

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By CourtNews Desk On 08 Aug, 2026
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100% झुलसी पत्नी का ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ (मृत्युपूर्व बयान) माना वैध; कहा— शारीरिक स्थिति गंभीर होने पर भी अगर पीड़ित बोलने में सक्षम है, तो बयान विश्वसनीय है

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद के बालीपुर थाना कांड से जुड़े करीब आठ साल पुराने हत्या मामले में दोषी खगेन राजवार की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने छह अगस्त 2026 को फैसला सुनाया। मामला क्रिमिनल अपील (डीबी) संख्या 488/2018 से संबंधित था। मामला 21 मार्च 2016 की रात का है। अभियोजन के अनुसार खगेन राजवार शराब के नशे में घर पहुंचा था। उसकी पत्नी सरिता देवी ने शराब पीने का विरोध किया तो उसने उसके साथ मारपीट की और शरीर पर मिट्टी तेल डालकर आग लगा दी। गंभीर रूप से झुलसी सरिता देवी को धनबाद के पीएमसीएच ले जाया गया। अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में 22 मार्च की सुबह करीब तीन बजे पुलिस ने चिकित्सक डॉ. लक्ष्मी नारायण की मौजूदगी में उसका फर्दबयान दर्ज किया। बाद में इलाज के दौरान 27 मार्च 2016 को उसकी मौत हो गई।

100 फीसदी जलने के बावजूद बयान देने पर उठे सवाल

अपील में खगेन की ओर से मुख्य दलील दी गई कि सरिता का शरीर करीब 100 फीसदी जल गया था, इसलिए वह बयान देने की स्थिति में नहीं थी। बचाव पक्ष ने चिकित्सक डॉ. एमएन सिन्हा की लिखित टिप्पणी का भी हवाला दिया, जिसमें 22 मार्च की शाम 5.56 बजे मरीज को बयान देने की स्थिति में नहीं बताया गया था। साथ ही यह भी दलील दी गई कि कई गवाहों ने आरोपी को आग बुझाने का प्रयास करते देखा और इस दौरान उसे भी जलने की चोट लगी थी। हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि सरिता का फर्दबयान इससे करीब 14 घंटे पहले, सुबह तीन बजे दर्ज हुआ था। उस समय डॉ. लक्ष्मी नारायण ने स्पष्ट रूप से कहा था कि सरिता बयान देने की स्थिति में थी। पुलिस अधिकारी एएसआई अशोक कुमार तिवारी ने भी कहा कि बयान दर्ज करते समय सरिता बोल रही थी। अदालत ने माना कि बाद में उसकी स्थिति बिगड़ सकती थी और शाम 5.56 बजे की चिकित्सकीय टिप्पणी सुबह तीन बजे दर्ज बयान को अविश्वसनीय नहीं बनाती।

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मरने से पहले दिया बयान बना आधार

अदालत ने कहा कि सरिता के फर्दबयान को मृत्यु पूर्व बयान के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इसमें उसने अपने पति पर मारपीट करने, मिट्टी तेल डालने और आग लगाने का स्पष्ट आरोप लगाया था। उसके बयान की पुष्टि उन परिस्थितियों से भी हुई, जिनमें पड़ोसी और उसके जेठ ने उसे जली अवस्था में देखा था। अदालत ने यह भी माना कि 100 फीसदी जलने की स्थिति अपने आप में मृत्यु पूर्व बयान को अविश्वसनीय नहीं बनाती। महत्वपूर्ण यह है कि बयान देते समय पीड़िता सचेत और बोलने की स्थिति में थी या नहीं।

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खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि मृत्यु पूर्व बयान स्वैच्छिक, स्पष्ट और विश्वसनीय हो तो केवल उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि कायम की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि बयान दर्ज कराने के समय मौजूद चिकित्सक और पुलिस अधिकारी की गवाही से सरिता के सचेत होने की पुष्टि होती है।

निचली अदालत का फैसला बरकरार

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन ने खगेन राजवार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आरोप संदेह से परे साबित किया है। अदालत ने आठ मार्च 2018 को धनबाद के अपर सत्र न्यायाधीश सप्तम द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। निचली अदालत ने खगेन को उम्रकैद के साथ पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

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