Ranchi News: रांची विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज (आईएलएस) के छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। बुधवार को इस मामले की पहली सुनवाई न्यायमूर्ति राजेश कुमार की अदालत में हुई, जहां कोर्ट ने रांची विश्वविद्यालय से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें गलत डिग्रियां दी जा रही हैं और लंबे समय से उठाई जा रही मांगों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। छात्रों के अनुसार, आईएलएस को यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट होने के बावजूद “इंस्टीट्यूट” के नाम से संचालित किया जा रहा है और डिग्रियों में भी यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट की बजाय इंस्टीट्यूट का नाम अंकित किया जा रहा है, जो नियमों के विरुद्ध है।
वहीं विश्वविद्यालय पदाधिकारियों का दावा है कि आईएलएस एक यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ही है, जिसे केवल इंस्टीट्यूट के नाम से संचालित किया जा रहा है। इसी को लेकर छात्रों ने सवाल उठाया है कि जब यह डिपार्टमेंट है, तो इसे इंस्टीट्यूट के नाम से चलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। छात्रों ने कोर्ट को बताया कि वे बीते कई महीनों से विश्वविद्यालय प्रशासन के विभिन्न पदाधिकारियों से मिलकर अपनी समस्याएं उठाते रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। छात्रों की प्रमुख मांगों में मूट कोर्ट की स्थापना, फैकल्टी की संख्या बढ़ाना—जहां वर्तमान में केवल छह फैकल्टी कार्यरत हैं, जबकि नियमानुसार दस फैकल्टी अनिवार्य हैं—और स्थायी निदेशक की नियुक्ति शामिल है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के नियमों के अनुसार किसी यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट में निदेशक का पद नहीं होता, जबकि आईएलएस में निदेशक का पद दर्शाया जा रहा है। छात्रों का कहना है कि बीसीआई के मानकों का पालन नहीं होने से उनके भविष्य पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने प्रतिवादी रांची विश्वविद्यालय के डीन, सीवीएस के निदेशक, उप-निदेशक, रजिस्ट्रार समेत अन्य पदाधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित अवधि में यह बताया जाए कि पूरे मामले में गलती किस स्तर पर हुई है और छात्रों के भविष्य से जुड़े इस गंभीर मुद्दे के लिए कौन जिम्मेदार है। इस याचिका में अंबेश चौबे, आर्यन देव, तुषार दुबे और देवेश नंद तिवारी मुख्य याचिकाकर्ता हैं, जबकि इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज के सभी छात्र इस याचिका में शामिल हैं।