Ranchi News: झारखंड उच्च न्यायालय ने डायन-बिसाही के आरोप में 1996 में हुई एक महिला की हत्या के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को खारिज करते हुए उसे बरी कर दिया है। जस्टिस एस.एन. प्रसाद और जस्टिस पी.के. श्रीवास्तव की खंडपीठ ने अपीलकर्ता मनसू मांझी उर्फ मांसा मांझी की दोषसिद्धि को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
यह फैसला आपराधिक न्यायशास्त्र के इस बुनियादी सिद्धांत को रेखांकित करता है कि जब तक अपराध ‘संदेह से परे’ साबित न हो, तब तक किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
30 साल पुराना मामला: क्या था आरोप?
यह मामला करीब तीन दशक पुराना है।
- घटना: 2 सितंबर 1996 को बोकारो जिले के बालीडीह थाना क्षेत्र के वंशिमली गांव में चांदमनी मांझियान नामक महिला की कथित तौर पर हत्या कर दी गई थी।
- वजह: महिला पर डायन होने का आरोप था। घटना से एक रात पहले भी गांव में इस बात को लेकर पंचायत हुई थी।
- आरोप: मृतक महिला के बेटे रूपलाल मांझी (सूचक) ने आरोप लगाया था कि मनसू मांझी और रघुनाथ मांझी ने उसकी मां पर टांगी (कुल्हाड़ी) और लाठी से हमला किया।
- निचली अदालत का फैसला: साल 1999 में बोकारो की निचली अदालत ने मनसू मांझी को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जबकि दूसरे आरोपी रघुनाथ मांझी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था।
हाई कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला? (गवाही में विरोधाभास)
हाई कोर्ट ने जब अपीलकर्ता की याचिका पर सुनवाई की, तो पाया कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला विरोधाभासों से भरा हुआ है और वे इसे संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहे:
- गवाहों के बयानों में टकराव: इस मामले में मृतका के बेटे रूपलाल मांझी को इकलौता प्रत्यक्षदर्शी (चश्मदीद) माना गया था। उसने दावा किया कि उसने अपनी मां पर हमला होते हुए खुद देखा था। लेकिन उसकी पत्नी बसंती देवी के बयान ने इस दावे को कमजोर कर दिया। बसंती देवी ने गवाही दी कि उन्होंने सिर्फ हल्ला सुना था कि उनकी सास की हत्या हो गई है, जिसके बाद वह अपने पति (रूपलाल) के साथ घटनास्थल पर पहुंची थीं।
- हथियार को लेकर भ्रम: सूचक ने शुरुआती बयान में कुल्हाड़ी (टांगी) से हमला होने का जिक्र किया था, लेकिन कोर्ट में सुनवाई के दौरान उसने कहा कि हमला तलवार से किया गया था। इस बड़े विरोधाभास ने केस की बुनियाद को हिला दिया।
सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों और ‘संदेह के लाभ’ का हवाला
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण नजीरों (Judgments) का हवाला दिया:
- बिपिन कुमार मंडल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2010)
- शीलम रमेश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1999)
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी: “एकल गवाह (Single Witness) के बयान के आधार पर भी किसी को सजा दी जा सकती है, लेकिन शर्त यह है कि उसकी गवाही पूरी तरह से विश्वसनीय और ठोस होनी चाहिए। यदि किसी मामले में दो दृष्टिकोण (Views) सामने आ रहे हों—एक जो आरोपी को दोषी ठहराए और दूसरा जो उसे निर्दोष बताए, तो हमेशा आरोपी के पक्ष वाले दृष्टिकोण को ही अपनाया जाना चाहिए।”
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास होने के कारण आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) मिलना चाहिए। इसी आधार पर कोर्ट ने बोकारो की निचली अदालत के 1999 के आदेश को निरस्त करते हुए मनसू मांझी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।