50 साल पुरानी जमीन की खरीद भी नहीं बचा सकी गैर-आदिवासियों का दावा
Ranchi News: झारखंड उच्च न्यायालय ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) के प्रावधानों का उल्लंघन कर गैर-आदिवासी द्वारा खरीदी गई आदिवासी भूमि के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने रामगढ़ जिले के पतरातू अंचल स्थित ग्राम घुटवा की 0.67 एकड़ जमीन के हस्तांतरण को अवैध ठहराते हुए याचिकाकर्ता कयूम अंसारी व अन्य की रिट याचिका खारिज कर दी। अदालत ने प्रमंडलीय आयुक्त के उस आदेश को सही ठहराया, जिसके तहत जमीन आदिवासी महिला सुरपति देवी को वापस (Restoration) करने का निर्देश दिया गया था।
1970 की केवाला खरीद को अदालत ने माना अवैध मामला रामगढ़ (तत्कालीन हजारीबाग) जिले के पतरातू प्रखंड के ग्राम घुटवा स्थित खाता संख्या 42, प्लॉट संख्या 1273 से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उनके पिता सादिक मियाँ ने 1970 में खतियानी रैयत सुकरा बेदिया से 0.92 एकड़ भूमि केवाला (बिक्री पत्र) के जरिए खरीदी थी और वे तब से उस पर काबिज थे। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि बेदिया समुदाय अनुसूचित जनजाति (ST) की श्रेणी में नहीं आता।
संविधान के तहत बेदिया समुदाय अनुसूचित जनजाति घोषित अदालत ने याचिकाकर्ताओं की दलील को खारिज करते हुए 6 सितंबर 1950 की भारत सरकार की गजट अधिसूचना (The Constitution (Scheduled Tribes) Order, 1950) का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिसूचना के अनुसार ‘बेदिया’ जाति स्पष्ट रूप से अनुसूचित जनजाति की सूची में दर्ज है।
बिना उपायुक्त की अनुमति के हस्तांतरण अमान्य हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सीएनटी एक्ट की धारा 46(1) के तहत किसी भी आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासी को हस्तांतरित करने के लिए उपायुक्त (DC) की पूर्व अनुमति अनिवार्य है। धारा 46(3) के अनुसार, कानून का उल्लंघन कर किया गया कोई भी हस्तांतरण पूरी तरह अमान्य है। मामले में प्रतिवादी सुरपति देवी ने वर्ष 2003 में उपायुक्त की विधिवत अनुमति लेकर उसी जमीन का 0.67 एकड़ हिस्सा खरीदा था। कोर्ट ने माना कि बेदखली के बाद 6 महीने के भीतर दायर उनका बहाली आवेदन पूरी तरह समय-सीमा के भीतर था।

