high court news

HC News: टेंडर निवेश मामला: हर एग्रीमेंट का टूटना धोखाधड़ी नहीं; 1.91 करोड़ के केस में झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, आपराधिक कार्यवाही रद

CourtNews Desk
By CourtNews Desk On 03 Jun, 2026
1 min read • 1.2k views
WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
jharkhand high court
WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

Ranchi News: झारखंड हाई कोर्ट ने व्यापारिक समझौतों और आपराधिक मुकदमों को लेकर एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट के जस्टिस ए.के. चौधरी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि हर अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) का उल्लंघन या वादाखिलाफी धोखाधड़ी (Cheating) की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने निवेशकों से 1.91 करोड़ रुपये लेने के मामले में दो व्यवसायियों के खिलाफ निचली अदालत में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही और पुलिस की प्राथमिकी (FIR) को निरस्त (Quash) कर दिया है। अदालत ने इस पूरे मामले को विशुद्ध रूप से एक सिविल (दीवानी) विवाद करार दिया है।

यह आदेश याचिकाकर्ता विमल कुमार अग्रवाल और प्रतीक अग्रवाल की ओर से दायर क्रिमिनल मिसलेनियस याचिका पर सुनवाई के बाद आया। याचिकाकर्ताओं ने जमशेदपुर के सोनारी थाना में दर्ज केस और अदालत की संज्ञान प्रक्रिया को चुनौती दी थी।

क्या था पूरा मामला?

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि विमल और प्रतीक अग्रवाल ने उनसे रेलवे टेंडर वर्क (Railway Tender Work) के कारोबार में निवेश के नाम पर कुल 1.91 करोड़ रुपये लिए थे। आरोपियों ने निवेश के बदले मोटा मुनाफा देने का वादा किया था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि पैसे लेने के बाद याचिकाकर्ताओं ने न तो उन्हें कोई मुनाफा दिया और न ही उनके मूल पैसे वापस लौटाए। इसी शिकायत के आधार पर सोनारी थाना पुलिस ने धोखाधड़ी की धाराओं में मामला दर्ज कर अदालत में आरोप पत्र (Charge Sheet) भी दाखिल कर दिया था।

See also  सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सही बात का समर्थन करने वाले जज बनाए जा रहे निशाना, अमीर-गरीब के लिए अलग कानून नहीं हो सकता

सुप्रीम कोर्ट के ‘उमाशंकर गोपालिका’ फैसले का हवाला

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता नीलेश कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों की नजीर पेश की। उन्होंने शीर्ष अदालत के प्रसिद्ध ‘उमाशंकर गोपालिका बनाम बिहार राज्य’ मामले का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए दलील दी:

“धोखाधड़ी (IPC की धारा 420/BNSS की सुसंगत धाराएं) का अपराध केवल तभी बनता है, जब लेन-देन या समझौते की शुरुआत (Inception) में ही आरोपी का इरादा धोखा देने का रहा हो। अगर शुरुआती लेन-देन साफ-सुथरा था और बाद की परिस्थितियों या व्यापारिक घाटे के कारण कोई व्यक्ति पैसे लौटाने में असमर्थ हो जाता है, तो उसे आपराधिक विश्वासघात या धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता। यह केवल सिविल कोर्ट का विषय है।”

माननीय हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी

जस्टिस ए.के. चौधरी की अदालत ने मामले के सभी दस्तावेजों और पुलिस की केस डायरी का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि शिकायत में कहीं भी यह जिक्र नहीं है कि याचिकाकर्ताओं का इरादा शुरू से ही बेईमानी करने का था। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:

“इस मामले में यदि अभियोजन पक्ष और शिकायतकर्ता के सभी आरोपों को सच भी मान लिया जाए, तो भी पहली नजर में धोखाधड़ी का कोई आपराधिक मामला सिद्ध नहीं होता। यह विवाद अधिकतम एक दीवानी प्रकृति (Civil Dispute) का मामला है, जिसे केवल दबाव बनाने और बदले की भावना से आपराधिक रूप (Criminal Color) दे दिया गया है। दीवानी मामलों के निपटारे के लिए फौजदारी अदालतों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जा सकता।”

हाई कोर्ट ने माना कि पुलिस द्वारा इस मामले में चार्जशीट दाखिल करना और निचली अदालत द्वारा संज्ञान लेना कानूनन गलत था। इसके साथ ही अदालत ने दोनों याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत देते हुए जमशेदपुर की अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही और सोनारी थाने की एफआईआर को पूरी तरह से रद कर दिया।

See also  HC News: हाईकोर्ट ने ऑनलाइन म्यूटेशन को दी हरी झंडी, ऑफलाइन पर अड़े आवेदकों को झटका”
WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
CourtNews Desk

CourtNews Desk

Bringing you the latest news and in-depth analysis from around the world.

Leave a Comment