1.5 करोड़ का कर्ज, 2.56 लाख की ईएमआई, आय 1.80 लाख बताने पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल
पत्नी को 20 लाख और बेटी के नाम 30 लाख की सावधि जमा का आदेश
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए पत्नी के स्थायी भरण-पोषण के लिए कुल 30 लाख रुपये तय किए हैं। अदालत ने पहले से मिले 10 लाख रुपये को समायोजित करते हुए पति को अब 20 लाख रुपये और चार बराबर किस्तों में देने का निर्देश दिया है। इसके अलावा नाबालिग बेटी के भविष्य, शिक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उसके नाम 30 लाख रुपये की सावधि जमा कराने का आदेश दिया है। यह आदेश जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने P सिंह(Name changed) की प्रथम अपील पर सुनाया।
आठ साल बाद पति ने मांगा था तलाक
मामले के अनुसार P सिंह और R सिंह की शादी 28 दिसंबर 2016 को छत्तीसगढ़ के भिलाई स्थित नेहरू नगर गुरुद्वारा में सिख रीति-रिवाज से हुई थी। दोनों की एक बेटी है। पति का आरोप था कि शादी के बाद दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए और पत्नी बार-बार मायके चली जाती थी। पति ने पत्नी को वापस लाने का प्रयास किया, लेकिन विवाद समाप्त नहीं हुआ। इसके बाद दोनों पक्षों की ओर से कई मुकदमे दर्ज हुए। पत्नी ने पति और उसके परिजनों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना समेत अन्य धाराओं में मामला दर्ज कराया। भरण-पोषण और घरेलू हिंसा कानून के तहत भी कार्यवाही शुरू की गई। दूसरी ओर पति ने बेटी की अभिरक्षा और संरक्षकता को लेकर भी न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ था। इसमें पति ने पत्नी और बेटी के सभी दावों के पूर्ण और अंतिम निपटारे के लिए 20 लाख रुपये देने पर सहमति जताई थी। पति ने 10 लाख रुपये दे भी दिए, जिसे पत्नी ने स्वीकार कर भुना लिया। बाद में पत्नी ने तलाक के लिए अपनी सहमति वापस ले ली। इसके बाद पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक का मुकदमा दायर किया। पारिवारिक न्यायालय ने पत्नी की अनुपस्थिति में एकतरफा सुनवाई करते हुए 25 मार्च 2025 को तलाक मंजूर कर दिया।
हाईकोर्ट में पत्नी ने कहा-आय का कोई स्रोत नहीं
इस फैसले के खिलाफ पत्नी हाईकोर्ट पहुंची। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने माना कि अब साथ रहने की कोई संभावना नहीं है। अदालत ने दोनों की संपत्ति और आय का ब्योरा हलफनामे के माध्यम से मांगा। चाईबासा के उपायुक्त को भी पति की चल-अचल संपत्ति और आय के स्रोत की जानकारी देने का निर्देश दिया गया। पति ने हलफनामे में बताया कि वह इंडियन ट्रेडिंग कंपनी का एकमात्र स्वामी है और मोटर पार्ट्स व संबंधित उपकरणों की आपूर्ति का कारोबार करता है। उसने अपनी मासिक आय 1.80 लाख रुपये बताई। साथ ही करीब 1.30 करोड़ रुपये का कर्ज और 2.80 लाख रुपये मासिक ईएमआई बताई। जांच में एक कार के कर्ज को अलग करने के बाद भी करीब 1.18 करोड़ रुपये का कर्ज और लगभग 2.56 लाख रुपये मासिक ईएमआई सामने आई।
आय से अधिक ईएमआई पर कोर्ट ने उठाए सवाल
खंडपीठ ने कहा कि यदि पति की मासिक आय वास्तव में 1.80 लाख रुपये है तो वह हर महीने 2.56 लाख रुपये की किस्त कैसे चुका रहा है। अदालत ने यह भी पाया कि कुल कर्ज का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा तलाक का मुकदमा दायर होने के बाद लिया गया था। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि पति ने हलफनामे में अपनी वास्तविक आय नहीं बताई है और उसकी वास्तविक आय बताई गई आय से अधिक है। अदालत ने कहा कि केवल कर्ज की किस्त चुकाने के आधार पर पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी कम नहीं की जा सकती। संपत्ति बनाने या भविष्य में धन बढ़ाने के लिए लिए गए कर्ज की अदायगी को पत्नी के भरण-पोषण की वैधानिक जिम्मेदारी से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
पत्नी की उम्र और भविष्य का भी रखा ध्यान
खंडपीठ ने कहा कि पत्नी की उम्र 36 वर्ष है और उसे भविष्य में लंबे समय तक अपने जीवन-यापन के लिए आर्थिक सुरक्षा की जरूरत होगी। पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि स्थायी भरण-पोषण तय करने का कोई निश्चित गणितीय फार्मूला नहीं है। पति की आय, पत्नी की जरूरत, दोनों का सामाजिक स्तर, जीवन-शैली, पति की भुगतान क्षमता और भविष्य की महंगाई जैसे सभी पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है। अदालत ने पहले से मिले 10 लाख रुपये को समायोजित करते हुए कुल 30 लाख रुपये स्थायी भरण-पोषण तय किया। इसमें अब पति को 20 लाख रुपये अतिरिक्त देने होंगे। यह राशि 12 महीने के भीतर चार बराबर किस्तों में देनी होगी। पहली किस्त आदेश के दो महीने के भीतर देने का निर्देश दिया गया है।
बेटी के नाम भी 30 लाख की सावधि जमा
नाबालिग बेटी की शिक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अलग से 30 लाख रुपये की सावधि जमा उसके नाम कराने का निर्देश दिया। यह सावधि जमा एक वर्ष के भीतर बनाकर पत्नी को सौंपनी होगी। अदालत ने कहा कि पत्नी और बेटी के भविष्य को आर्थिक सुरक्षा देना जरूरी है। खंडपीठ ने पारिवारिक न्यायालय के तलाक के आदेश को पूरी तरह रद्द नहीं किया, बल्कि उसे स्थायी भरण-पोषण और बेटी के भविष्य के संबंध में दिए गए निर्देशों के अनुरूप संशोधित कर दिया। इसके साथ ही पत्नी की प्रथम अपील का निपटारा कर दिया गया।