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HC News: झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बस की छत पर सफर करने वाले की दुर्घटना में मौत पर भी मिलेगा पूरा मुआवजा, कोर्ट ने राशि बढ़ाकर ₹11.13 लाख की, 13 साल बाद मिला न्याय

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By CourtNews Desk On 18 Jul, 2026
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Ranchi News: झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) ने मोटर वाहन दुर्घटना दावों से जुड़े एक मामले में मानवीय और न्यायसंगत रुख अपनाते हुए बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) एम. एस. सोनाक की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई यात्री बस चालक के कहने या निर्देश पर बस की छत पर सफर कर रहा है, तो दुर्घटना की स्थिति में बीमा कंपनी या वाहन मालिक यह कहकर मुआवजे से इनकार नहीं कर सकते कि यात्री ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 123(2) का उल्लंघन किया था। अदालत ने पीड़ित परिवार की आर्थिक स्थिति और सुप्रीम कोर्ट के मार्गदर्शक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित ₹6.41 लाख के मुआवजे को बढ़ाकर ₹11,13,360 (11.13 लाख रुपये) कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने ‘पे एंड रिकवरी’ (पहले बीमा कंपनी भुगतान करे, फिर मालिक से वसूले) के आदेश को भी बरकरार रखा है।

क्या है पूरा मामला?

यह कानूनी विवाद वर्ष 2010 में गिरिडीह में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। एक कुशल मजदूर, मालचंद मुर्मू (उम्र 22 वर्ष), टी.डी.वी. बस (संख्या JH 11 A 2955) की छत पर सफर कर रहे थे। इस दौरान ड्राइवर द्वारा बस को काफी तेज और लापरवाही से चलाने के कारण दुर्घटना हो गई, जिसमें मालचंद मुर्मू की मौत हो गई। गिरिडीह के मोटर वाहन दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल (MVACT) ने 5 अप्रैल 2013 को अपने फैसले में पीड़ित परिवार को ₹6,41,200 का मुआवजा देने और बीमा कंपनी (द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) को ‘पे एंड रिकवरी’ का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में दो अलग-अलग अपील दायर की गई थीं.

  1. : मृतक की पत्नी अमिता देवी और परिवार की ओर से मुआवजे की राशि बढ़ाने (Enhancement) के लिए।
  2. : बस मालिक (दिवंगत सुमिता समंता के कानूनी वारिस दिलीप कुमार समंता व अन्य) की ओर से, जिसमें ‘पे एंड रिकवरी’ के आदेश को चुनौती दी गई थी।
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कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें

  • बस मालिक के वकील (श्री संदीप वर्मा): उन्होंने दलील दी कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 123(2) के तहत बस की छत, बोनट या रनिंग बोर्ड पर सफर करना कानूनी रूप से प्रतिबंधित है। मृतक के पास छत पर सफर करने का कोई टिकट भी नहीं था। इसलिए, नियमों का उल्लंघन करने के कारण पीड़ित परिवार किसी भी मुआवजे का हकदार नहीं है।
  • दावेदारों/पीड़ित पक्ष के वकील (श्री अरविंद कुमार लाल): उन्होंने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल ने मृतक की आय का सही आकलन नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट के सरला वर्मा व प्रणय सेठी मामलों के तहत मिलने वाले ‘फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स’ (भविष्य की संभावनाएं), कंसोर्टियम (सहानुभूति भत्ता) और अंतिम संस्कार के खर्चों को सही से नहीं जोड़ा।
  • चश्मदीद की गवाही बनी टर्निंग पॉइंट: घटना के वक्त छत पर साथ सफर कर रहे चश्मदीद गवाह गणेश मुर्मू (CW-3) ने कोर्ट को बताया कि वे लोग बस ड्राइवर के कहने (Express Instruction) पर ही छत पर चढ़े थे और मना करने के बावजूद ड्राइवर लापरवाही से बस चलाता रहा।
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हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने दोनों अपीलों पर साझा फैसला सुनाते हुए बस मालिक की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कलकत्ता हाईकोर्ट के जिस पुराने फैसले का हवाला देकर मुआवजे से बचने की कोशिश की जा रही है, वह यहां लागू नहीं होता; क्योंकि वहां ड्राइवर के कहने पर छत पर चढ़ने का कोई सबूत नहीं था, जबकि इस मामले में ड्राइवर की सीधी लापरवाही और निर्देश साबित हुए हैं।

बीमा कंपनी को 6 हफ्ते का समय अदालत ने ‘द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड’ को निर्देश दिया है कि वह ट्रिब्यूनल के पुराने भुगतान के बाद बची हुई बढ़ी हुई राशि (ब्याज समेत) को 6 सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करे। अदालत ने सख्त हिदायत दी है कि यह राशि सीधे दावेदार (अमिता देवी) के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाएगी और बैंकिंग चैनलों के अलावा किसी अन्य माध्यम से इसका भुगतान नहीं होगा। बीमा कंपनी यह राशि भुगतान करने के बाद बस मालिक से वसूलने की हकदार होगी।

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