Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत ने अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने और रहने के मामले में सजायाफ्ता बांग्लादेशी नागरिक मोहम्मद नजमुम हवलदार की आपराधिक अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने कड़े फैसले में स्पष्ट किया कि जब आरोपी ने निचली अदालत में खुद अपना जुर्म स्वीकार कर लिया था, तो कानून के तहत सजा की वैधता और सीमा के अलावा ऐसी अपील सुनवाई योग्य नहीं है। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई है कि कानूनी सजा पूरी होने और नागरिकता का सत्यापन होने के बावजूद विदेशी नागरिकों को तुरंत डिपोर्ट (देश निकाला) क्यों नहीं किया गया। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि ऐसे घुसपैठियों को जेल में रखकर टैक्सपेयर्स के पैसों से खाना और अन्य सुविधाएं मुहैया कराना पूरी तरह अनुचित है।
मामले की पृष्ठभूमि और कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
अदालत में अपील की स्थिति: याचिकाकर्ता (मोहम्मद नजमुम हवलदार) ने साहिबगंज जिले की राजमहल अदालत (Additional Sessions Judge-I) द्वारा Foreigners Act की धारा 14A(b) के तहत सुनाई गई 2 साल की सजा और 10,000 रुपये जुर्माने के फैसले को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि अभियुक्त ने खुद अदालत में अपना गुनाह कबूल किया था। ऐसे में, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 416 के प्रावधानों के तहत जुर्म कबूल करने के बाद इस प्रकार की अपील पोषणीय (Maintainable) नहीं पाई गई और कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
दूतावास और प्रशासनिक लापरवाही पर कड़ा रुख: सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि अभियुक्त की सजा 11 फरवरी 2025 को पूरी हो चुकी थी और उसे डिपोर्टेशन के लिए हज़ारीबाग के होल्डिंग फॉरेनर्स कैंप भेजा गया था। हालांकि, बाद में वह अन्य कैदियों के साथ कैंप से फरार हो गया था, जिसके बाद उसके खिलाफ लोहसिंघना थाने में एक नया मामला दर्ज कर उसे दोबारा गिरफ्तार किया गया।
अदालत ने पश्चिम बंगाल के डिप्टी हाई कमीशन द्वारा शुरू में नागरिकता के सत्यापन में की गई हीलाहवाली पर भी असंतोष जताया। कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी ने खुद स्वीकार कर लिया था कि वह बांग्लादेशी नागरिक है और वह अवैध रूप से बिना पासपोर्ट के रह रहा था, तो बार-बार पत्राचार के नाम पर प्रक्रिया को लंबा खींचना और देश की आंतरिक सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सुरक्षा एजेंसियों और तंत्र को सख्त निर्देश: हाईकोर्ट ने झारखंड सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय व विदेश मंत्रालय) को यह स्पष्ट निर्देश दिया है कि:
अपीलार्थी नजमुम हवलदार के अलावा अन्य विदेशी नागरिकों (जैसे रीना खान और निपा अख्तर ख़ुशी) को बिना किसी अतिरिक्त विलंब के उनके देश डिपोर्ट किया जाए।
साहिबगंज के पुलिस अधीक्षक (SP) को निर्देश दिया गया है कि वे उन स्थानीय लोगों (जैसे राहुल और मोहम्मद सागर) की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच करें, जो सीमा पार से अवैध घुसपैठियों को भारत में लाने और उन्हें फर्जी पहचान व नौकरियां दिलाने के इस अवैध रैकेट का संचालन कर रहे हैं।
कम्प्लायंस रिपोर्ट (अनुपालन रिपोर्ट) तलब: अदालत ने इस आदेश की कॉपियां मुख्य सचिव (झारखंड व पश्चिम बंगाल), गृह सचिव, डीजीपी और केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों के सचिवों को भेजने का आदेश दिया है। साथ ही, सभी संबंधित प्राधिकारियों को 25 नवंबर 2026 तक इस पूरे मामले में सख्त कार्रवाई करते हुए अनुपालन रिपोर्ट हाईकोर्ट में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने चेताया है कि निर्देशों का पालन न होने पर इसे अधिकारियों की गंभीर लापरवाही माना जाएगा।

