Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और यौन अपराधों की पीड़िताओं के अधिकारों की सुरक्षा, त्वरित जांच, समयबद्ध ट्रायल, मुआवजा, शिक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करने को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश और खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार, पुलिस, न्यायालयों और संबंधित विभागों को कई अनिवार्य कदम उठाने का आदेश दिया है।
कोर्ट के प्रमुख निर्देश
● पीड़िताओं को मिलेगा अंतरिम और अंतिम मुआवजा
हाईकोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों से संबंधित मामलों में ट्रायल कोर्ट पीड़िता की तत्काल जरूरतों का आकलन कर अंतरिम मुआवजा दे सकती है। साथ ही मुकदमे के अंत में, चाहे आरोपी दोषी ठहरे या बरी हो जाए, पीड़िता को न्यायोचित मुआवजा देने पर विचार किया जाए। मुआवजे का भुगतान 30 दिनों के भीतर किया जाए।
● दुष्कर्म मामलों का ट्रायल दो माह में पूरा करने का निर्देश
अदालत ने कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई बीएनएसएस की समय-सीमा के अनुरूप की जाए और अनावश्यक स्थगन से बचा जाए।
● पुलिस जांच पर विशेष निगरानी
झारखंड के डीजीपी को यौन अपराध मामलों के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित करने तथा मामलों की त्रैमासिक समीक्षा करने का निर्देश दिया गया है, ताकि जांच और गवाहों की पेशी समय पर सुनिश्चित हो सके।
● दुष्कर्म पीड़िता से जन्मे बच्चों को कक्षा 12 तक मुफ्त शिक्षा
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को प्रत्येक जिले में नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया है, जो यह सुनिश्चित करेंगे कि दुष्कर्म पीड़िताओं से जन्मे बच्चों को कक्षा 12 तक निःशुल्क शिक्षा मिले। मेधावी छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति देने का भी निर्देश दिया गया है।
● पीड़िता की पहचान उजागर करने पर कार्रवाई
अदालत ने कहा कि दुष्कर्म पीड़िता का नाम या पहचान किसी भी माध्यम से उजागर नहीं की जा सकती। अदालत, पुलिस और मीडिया सभी को इस नियम का सख्ती से पालन करना होगा। उल्लंघन करने वालों के खिलाफ विभागीय और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
● जांच दो माह में पूरी करने का आदेश
कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म मामलों में प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर और पूरी जांच दो माह के भीतर समाप्त की जानी चाहिए। पीड़िताओं को तत्काल कानूनी सहायता, चिकित्सा सुविधा और मनोसामाजिक परामर्श उपलब्ध कराया जाए।
● ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर पूर्ण प्रतिबंध
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर प्रतिबंध लगाने के लिए सर्कुलर जारी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस निर्देश का उल्लंघन पेशेवर कदाचार माना जाएगा और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई होगी।
कोर्ट के कड़े दिशा-निर्देश और आदेश के प्रमुख बिंदु:
- जीरो एफआईआर अनिवार्य: हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए आदेश दिया है कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस क्षेत्राधिकार की परवाह किए बिना तुरंत ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज करेगी । क्षेत्राधिकार के आधार पर शिकायत खारिज करना पूरी तरह गैरकानूनी है ।
- दोषी पुलिसकर्मियों पर दर्ज होगा केस: यदि कोई थाना प्रभारी या पुलिसकर्मी जीरो एफआईआर दर्ज करने से इनकार करता है, तो उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 199 के तहत सीधे आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाएगा ।
- महिला अधिकारी ही लेंगी बयान: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के नए नियमों के तहत किसी भी यौन उत्पीड़न पीड़िता का बयान केवल महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज करेगी और पीड़िता को एफआईआर की एक कॉपी मुफ्त दी जाएगी ।
- तुरंत मेडिकल और त्वरित ट्रांसफर: शिकायत मिलते ही पुलिस पहले पीड़िता का मेडिकल परीक्षण और शुरुआती जांच करेगी ताकि सबूत नष्ट न हों । इसके तुरंत बाद मामले को बिना किसी तकनीकी या भौगोलिक रुकावट के संबंधित थाने में ट्रांसफर किया जाएगा ।
कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों की पीड़िताओं को सम्मानजनक, संवेदनशील और न्यायपूर्ण व्यवस्था उपलब्ध कराना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है और सभी विभाग इन निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करें।